प्रा.डॉ. शंकर घनशामदास अंदानी
(आचार्य, सी ए.)
अहिल्या नगर, महाराष्ट्र
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
बाल कविता – मेरी प्रिय टीचर
मेरी टीचर सबसे प्यारी,
लगती हैं हमको न्यारी।
हँसकर हमको रोज पढ़ातीं,
नई-नई बातें समझातीं।
गलती हो तो प्यार से कहतीं,
अच्छे बनने की राह दिखातीं।
अक्षर-अक्षर ज्ञान सिखातीं,
सपनों को आकाश दिलातीं।
गिनती, कविता, गीत सुनाएँ,
खेल-खेल में पाठ पढ़ाएँ।
सच्चाई का पाठ पढ़ातीं,
मेहनत करना हमें सिखातीं।
सब बच्चों को समान मानतीं,
हर मुश्किल में साथ निभातीं।
उनसे हमने सीखा प्यारा,
ज्ञान से जग होता उजियारा।
टीचर हैं हमारी मार्गदर्शक,
बनती हैं जीवन की संरक्षक।
हम भी खूब पढ़ेंगे-लिखेंगे,
टीचर का नाम रोशन करेंगे।
मेरी टीचर सबसे प्यारी,
इनसे दुनिया लगती न्यारी।
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बाल कविता –
दीवाली का महोत्सव
दीवाली का आया त्योहार,
खुशियों से भर गया संसार।
घर-आँगन में दीप जलाएँ,
मिल-जुलकर हम गीत सुनाएँ।
रंगोली के रंग निराले,
लगते सुंदर दीपक वाले।
माँ ने लड्डू खूब बनाए,
पापा उपहार लेकर आए।
दादा-दादी हँसकर आए,
बच्चे खुशी से झूमे-गाएँ।
भैया ने दी फुलझड़ी प्यारी,
बहना लगती सबसे न्यारी।
नए कपड़े, मीठी बोली,
खुशियों से भर गई हर टोली।
अंधियारा अब दूर भगाएँ,
ज्ञान के दीप सभी जलाएँ।
प्रेम बाँटें, खुशियाँ बाँटें,
मिलकर सारे दीप सजाएँ।
स्वच्छ रहे अपना घर-द्वार,
यही हमारा सच्चा त्योहार।
दीवाली का महोत्सव प्यारा,
खुशियों से जगमग जग सारा।






