संजय सोंधी
(संयुक्त निदेशक)
शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
उल्टा दिमाग, सीधा राज
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की आप सभी सामान्य और ‘तथाकथित’ स्वस्थ दिमाग वालों को सहानभूति-भरी बधाई। हर साल 10 अक्टूबर को दुनिया भर में ढोल पीटा जाता है कि दिमाग को दुरुस्त रखिए, तनाव से बचिए और अपनी मानसिक सेहत का ख्याल रखिए। पर जरा ठहरकर सोचिए, क्या आज की इस उल्टी-पुल्टी, अजब-गजब और बेतुकी दुनिया में एक सामान्य और सीधे दिमाग वाला इंसान सचमुच सर्वाइव कर सकता है? जवाब है—हरगिज नहीं। इस दौर में तर्क, विवेक और सीधेपन की गटरी बांधकर जीने वाला इंसान दरअसल एक ऐसा आउटडेटेड सॉफ्टवेयर है जो हर मोड़ पर क्रैश होने के लिए अभिशप्त है। आज के माहौल में अगर आपको कामयाबी की सीढ़ियां चढ़नी हैं, समाज में सिर उठाकर जीना है और रोज़मर्रा की बेतुकी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाना है, तो आपका दिमाग थोड़ा अस्वस्थ, थोड़ा उल्टा और पूरी तरह से बेपटरी होना ही परम आवश्यकता है।
तथ्य यह है कि जिस दुनिया में हर चीज़ उलटे बांस बरेली को जा रही हो, वहां सीधा दिमाग रखना ही सबसे बड़ा मानसिक विकार है। आज की इस निर्व्यवस्था को देखिए। यहां सच्चाई को साबित करने के लिए पांच सौ दस्तावेज चाहिए और अफवाह फैलाने के लिए बस एक क्लिक। जो जितनी जोर से चीखता है, उसे उतना ही बड़ा ज्ञानी मान लिया जाता है। जो दिन-रात दूसरों की टांग खींचने में व्यस्त है, वह बड़ा नीतिकार है। जो सड़क पर बिना देखे हॉर्न बजाता हुआ आगे निकल जाए, वह ‘स्मार्ट’ है और जो रेड लाइट पर सलीके से गाड़ी रोक ले, उसे दुनिया बेवकूफ समझकर पीछे से गालियां देती है। अब आप ही बताइए, इस पूरी व्यवस्था को समझने और इसमें अपनी जगह बनाने के लिए क्या एक तर्कशील दिमाग काफी है? बिल्कुल नहीं। इसके लिए आपको उसी स्तर का मानसिक असंतुलन चाहिए जो इस अजब-गज़ब दौर की रफ्तार से मेल खा सके।
गूढ़ बात तो यह है कि सीधा दिमाग सवाल पूछता है, कारण ढूंढता है।






