मां दुर्गा की शक्ति और नारी का सम्मान!

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

नवापारा/राजिम

रायपुर, (छत्तीसगढ़)

   

 

                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड) 

                        आलेख –

        मां दुर्गा की शक्ति और नारी का सम्मान!

 

नारी शक्ति का प्रतीक, मां दुर्गा की वाणी!

      सृष्टि की रक्षा हेतु करती हैं अवतरित प्राणी!

                  -सुश्री सरोज कंसारी

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             मां दुर्गा भवानी नारी शक्ति का प्रतीक हैं। नारी दुर्गा, लक्ष्मी, शारदा बन सृजन करती हैं। मां दुर्गा की भोली सूरतिया और मोहनी मूरत भक्तों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सोलह श्रृंगार में माता ममतामयी देवी के रूप में सारे संसार को अपने दिव्य गुणों से वशीभूत करती हैं।

 

             मां दुर्गा भवानी नारी शक्ति का प्रतीक हैं। नारी दुर्गा, लक्ष्मी, शारदा बन सृजन करती हैं। मां दुर्गा की भोली सूरतिया और मोहनी मूरत भक्तों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित करती हैं। सोलह श्रृंगार में माता ममतामयी देवी के रूप में सारे संसार को अपने दिव्य गुणों से वशीभूत करतीं हैं।

 

         मां दुर्गा के विभिन्न नाम है। अंबे, चंडी काली, नारायणी, सती, भवानी, शारदे, लक्ष्मी और शीतला आदि। मां की भक्ती में असीम शक्ति होती हैं । जो संकट के समय सकल मानवता की रक्षा हेतु किसी न किसी रूप में सृष्टि में अवतरित होती हैं।

 

               नवरात्र में माता की विशेष पूजन आरती से भक्ती और शक्ति के मिलन से आध्यात्म के नए युग का प्रारंभ होता हैं। जो मानव मन की सुप्त अवस्था को जाग्रत कर चिंतन, ध्यान, एकाग्रता नैतिकता और सदमार्ग। हेतु प्रेरित करती हैं।

 

           जहां पवित्र भाव से माता के चरणों में श्रद्धा के सुमन अर्पित होता है, वहीं ह्रदय के हर विकार स्वमेव दूर हो जाते हैं। मनुष्य जीवन का लक्ष्य श्रेष्ठ कर्म कर मोक्ष को प्राप्त करना हैं।जो आध्यात्म के सहारे ही संभव हैं। प्राचीन काल से देवी की अराधना की परंपरा चलती आ रही हैं। किसी भी शुभ कार्य से पहले माता के आशिर्वाद लेने से कार्य सफल होते हैं ऐसी मान्यता है, जो आज तक प्रचलित है, जो जगत जननी के रूप में स्थापित हैं वहीं समस्त सृष्टी को संचालित करती हैं।

 

               माता दुर्गा आदि शक्ती स्वरूपा हैं जो समस्त गुणों की सार हैं। विश्वास और श्रद्धा के बिना जीवन शून्य और भाव विहीन होता हैं। ह्रदय की सच्ची प्रार्थना आत्मा को पावन बनाती हैं, जो परमात्मा तक पहुंचती हैं। क्योंकि आत्मा अजर-अमर हैं…। भौतिक-सुख क्षणिक हैं। जो मोह माया स्वार्थ के रूप में होती हैं। आत्मिक सुख की प्राप्ति के लिए मातारानी के अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ेगा, तभी आंनद के सागर मे हम डूब पाएंगे।

 

                नवरात्र में मां दुर्गा के विभिन्न रूपों के दर्शन से एक अलौकिक आंनद की प्राप्ति होती हैं। मां जगदम्बे विभिन्न अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होती हैं। जिनके पौराणिक और धार्मिक महत्त्व भी हैं। जिनमें-त्रिशल, भाला, तलवार, फरसा और खप्पर प्रमुख हैं। जो इस बात संकेत है की दुष्टों के अत्याचार को रोकने अपने अस्तित्व की रक्षा और जन-कल्याण के लिए खुद को मजबूत बनाने की सीख मिलती हैं।

 

             जीवन जीने के लिए हर चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना और आत्मरक्षा के लए विभिन्न हुनर हर मनुष्य के पास होना चाहिए। इसीलिए इस विशाल, भीषण संसार में दानव और दुष्ट दोनो ही गुण और दुर्गुण से निर्मित इंसान होते हैं। ऐसी मान्यता है की-देवताओं को असुरों के आतंक से बचाने के लिए मां ने विभिन्न अस्त्र का प्रयोग किया था और मानवता की रक्षा के लिए दुष्ट दैत्यों का संहार किया।

 

                 नवरात्र में, नीम, किशमिश, लौंग, हिंगलाज फूल मखाना नीबू से बनी माला माता को पहनाई जाती हैं। माता दुर्गा भवानी को लाल रंग अति प्रिय हैं, जो साहस शौर्य, नई ऊर्जा का प्रतीक हैं। कहते हैं – राक्षसों का संहार करते समय उनके शरीर से निकले रक्त से माता लाल हो गई जिसे देख वह बहुत प्रसन्न हुई। उसका प्रिय रंग हो गया, तब से भक्त उन्हें लाली चुनर, बिंदी, कंगन भेंट कर भक्ति से शक्ति प्राप्त करते हैं।

 

          मां जगदम्बे सिंह पर सवार होती हैं जो हमें संदेश देती है मन की शक्ति बहुत बड़ी होती है। अपने मन के डर को भगाकर खुद में असीम शक्ति का संचार करें। दुखी-पीड़ित, बेबस बन शोक-संताप के लिए यह अमूल्य तन नहीं मिला हैं। त्याग, सेवा, समर्पण की राह चलकर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करें। कोई कितना भी बलवान क्यूं न हो बुरे कर्म की सजा जरूर मिलती हैं। और सत्य के आगे झुकना ही पड़ता हैं।

 

              माता दुर्गा नारी शक्ती का प्रतीक हैं…हर रुप में नारी वंदनीय पूज्यनीय हैं। जहां उनका सम्मान होता हैं मातारानी वहीं विराजमान होती हैं। इस धरा के हर कण में वह व्याप्त हैं, वात्सल्य से भरपूर स्नेह, करुणा, दया से सराबोर होकर अपने कर्तव्य का निर्वहन करती हैं।

 

          नन्हीं सी कली पुष्प बन महकती हैं, घर के आंगन में बेटी के रुप में चहकती है खिलखिलाती हैं और अपनी मीठी मुस्कान से हर किसी का दर्द दूर कर देती हैं। बेटी स्वयं देवी स्वरूप होती हैं, जिस घर में बेटे-बेटी में कोई भेदभाव नहीं किया जाता, उन्हें शिक्षा देकर आत्म निर्भर बनाया जाता हैं…जहां बेटी हंसती हैं वहां धन-धान्य ऐश्वर्य सुख-समृद्धि होती हैं।

 

            जब बेटी अपने यौवन अवस्था में आती हैं तो श्रृंगार करतीं हैं। शालीन, सहनशीलता, धैर्य, क्षमा के गुणों का और पार करतीं है दहलीज बाबुल के आंगन की सहेजती हैं पीहर का संसार पराई प्रीत अपनाती है, दो कुलो को जोड़ती हैं। हर अंजान रिश्तों के मोती लेकर सुंदर माला गूंथ लेती है और एकता के सूत्र में पिर लेती हैं । मां के अनेक रूप हैं, जो बेटी, बहू, मां बन मिसाल प्रस्तुत करती हैं। अपने आदर्श गुण स्थापित कर समय परिस्थिति और हालात के अनुसार ढल जाती हैं और वहीं चंडी, काली,

 

 

     दुर्गा, लक्ष्मी, शारदा भवानी और शीतला बन सृजन भी करती हैं। जहां आवश्यकता हो, प्रलय करने की शक्ति भी उसमे समाहित होती हैं।

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