राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
क्या लोकतंत्र बिकाऊ है?
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नीलामी से तो अवश्य ही बच गया है, लेकिन सवाल
रह गया है कि क्या लोकतंत्र बिकाऊ है?
राजस्थान स्थित बाड़मेर के लँगेरा गाँव की सरपंचई ग्यारह करोड़ में बिक गई, जिसमें लँगेरा गाँव के लगभग सभी निवासियों ने खुशी-खुशी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई।भारतीय लोकतंत्र के ज्ञात इतिहास में ये एक पहली ज्ञात दुर्घटना है।
हालाँकि बाद में ग्रामीणों ने इस कथित र्निविरोध सरपंचई नीलामी को सिरे से खारिज भी कर दिया और लोकतंत्र को नीलाम होने से बचा भी लिया, लेकिन सवाल रह गया है कि क्या लोकतंत्र बिकाऊ है?
किन्तु, परंतु, लेकिन इस नई नवेली राजनीतिक दुर्घटना ने देश के सामने,देशहित में, एक विचारणीय सवाल तो पैदा कर ही दिया है।
ये सिर्फ पंचायत और सरपंचई पद की नीलामी नहीं है, बल्कि सच्चाई तो यही है कि देश में चल रहे छद्म लोकतंत्र की ये एक ऐसी वास्तविकता भी है, जिसे जानते तो सभी हैं, लेकिन मानते नहीं हैं।
बाड़मेर स्थित जिस पंचायत का सालाना बजट पाँच करोड़ है, उसकी सरपंचई अगर ग्यारह करोड़ में बिकाऊ है, तो बाकी नागरिक-सेवाओं का क्या कहा जाए?
इस नीलामी से “लोकतंत्र बचाओ” आंदोलन के शौर्यवान-यौद्धाओं को क्या सीख मिलती है?
अगर बाड़मेर गाँव का ये धाँसू कारनामा, देश के अन्य नगरीय निकायों में भी, आमसहमति से अपनाये जाने की प्रायोजित माँग वाले आंदोलन शुरू हो जाएँ, तो कृपया कल्पना कर देखिये कि प्रधानमंत्री पद की नीलामी राशि कितनी होगी?
फिर क्या तो चुनाव और क्या मुख्य चुनाव आयुक्त? कौन कहेगा वोट चोर? कौन माँगेगा ज्ञानेशकुमार का इस्तीफा?
जब सब कुछ अड़ानी-अंबानी का नीलामी में ख़रीदा हुआ होगा,तब लाल कपड़ा क्या हनुमान की लँगोट बनाने जितना भी बच पाएगा?
दुनिया के ग़रीबों एक हो जाओ और समुद्र में डूब मरो? दुनिया के ग़रीबों एक हो जाओ और पाँच किलो राशन में जयकारे लगाओ? दुनिया के ग़रीबों एक हो जाओ और सरकारी ठेकों की आमद बढ़ाओ?
प्रख्यात विचारक काॅर्ल मार्क्स ने पूँजी और पूँजीगत-शक्तियों के विरुद्ध दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ का मूल-स्वभावगत मारक मंत्र दिया था, क्या हुआ उसका?
आज रूस और चीन के परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से साबित होता है कि गरीब और ग़रीबी पर अपनी-अपनी सटीक स्थापनाएँ तथा सटीक व्याख्याएँ देने वाले देवदूत, बेशुमार दौलत के मालिक बने बैठे हैं, जबकि विकासशील देशों की दुर्दशा पर दो आँसू बहाने वाला कोई नहीं है।
लगभग आठ सौ मतदाताओं के गाँव लँगेरा में बाईस लोग सरपंचई पद पाने की उम्मीद में जमा हुए थे और र्निविरोध सरपंचई की नीलामी शुरू हो गई। नीलामी राशि बढ़ते-बढ़ते ग्यारह करोड़ तक पहुँच गईं और देखते ही देखते सरपंचई सरेआम नीलाम हो गई। हालाँकि बाद में जिसे ग्रामीणों ने आमराय से अमान्य भी कर दिया।
इस तरह एक गाॅंव ने, एक गाँव में, एक गाँव के, लोकतंत्र को भरी सभा में सरेआम नीलाम होने से बचा लिया।
नीलामी से तो अवश्य ही बच गया है, लेकिन सवाल रह गया है कि क्या लोकतंत्र बिकाऊ है?






