राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
‘कर्मफल’ (भाग 19)
रेडियो आरक्षक की सरकारी और सुरक्षित मानी जाने वाली नौकरी को छोड़कर कर जब राजन वापस अपने घर लौटा, तो पूरे मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो गई। लोग पीठ पीछे हंसते और सामने सहानुभूति जताने के बहाने घावों पर नमक छिड़कते।
एक दोपहर, जब राजन घर के ओटले पर बैठकर बीड़ी के पत्तों को छाँट रहा था, तभी पड़ोसी रामदयाल वहाँ से गुजरा। राजन के हाथों में तंबाकू और धागा देखकर उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। वह रुका और थोड़ा करीब आकर व्यंग्य से बोला, “क्यों राजन! पुलिस की रौबदार नौकरी छोड़कर अब ये बीड़ी कब तक बनाओगे? क्या इसी दिन के लिए वर्दी पहनी थी? दो दिन ? राजन ने अपनी उंगलियों की रफ्तार धीमी नहीं की, उसने सहजता और पूरे आत्मविश्वास के साथ सिर उठाकर रामदयाल की आँखों में देखा और शांत स्वर में कहा, “बस एम.ए. करने तक, रामदयाल भाई साहब।
यह सुनते ही रामदयाल ठहाका मारकर हंसने लगा। उसकी हंसी में राजन के सपनों के प्रति गहरा उपहास था। वह अपनी ढीली धोती को संभालते हुए बोला, “एम.ए.? बड़े आए एम.ए. वाले! लिख के रख लो, सारी जिंदगी यही बीड़ी बनाना पड़ेगी। इस गरीबी में इतने ऊंचे ख्वाब मत पालो राजन, सपने देखना बंद करो और जो हकीकत है उसे स्वीकारो।
रामदयाल के वे कड़वे शब्द राजन के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतरे, लेकिन उन्होंने राजन के इरादों को कमजोर करने के बजाय और फौलादी बना दिया। उसने भीतर उठते आक्रोश को दबाया और चुपचाप अपने काम में जुट गया। वह जानता था कि वक्त ही हर ताने का सबसे सटीक जवाब होता है।
जैसे-तैसे, तंगहाली, समाज के उलाहनों और मानसिक तनाव के बीच एक-एक दिन कटता गया। राजन दिन में बीड़ी बनाता, माँ-बाप के संघर्ष में हाथ बंटाता और रातों को लालटेन की मद्धम रोशनी में एम.ए. की किताबों जो पुस्तकालय से लाया था, से अपना भविष्य बुनता। आखिरकार, वह कठिन साल भी बीत गया और राजन के एम.ए. की अंतिम वर्ष की परीक्षाएं समाप्त हो गईं।
परीक्षा के आखिरी दिन, जब वह परीक्षा केंद्र से बाहर निकला, तो उसकी जेबें पूरी तरह खाली थीं। घर लौटने की खुशी तो थी, लेकिन आगे क्या? यही यक्षप्रश्न उसके सामने खड़ा था। उसे पता चला था कि भोपाल के ‘परीक्षा पूर्व प्रशिक्षण केंद्र’ में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की तैयारी के लिए प्रवेश परीक्षाएं होने वाली हैं। यह उसके लिए एक सुनहरा अवसर था, लेकिन भोपाल जाने और वहाँ फॉर्म भरने तक के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। तभी उसकी मुलाकात अपने अजीज मित्र राजू चौरसिया से हुई। राजू राजन से उम्र में चार साल छोटा था,, राजन के भीतर सुलगती प्रशासनिक अधिकारी बनने की उस आग को बखूबी समझता था। राजन की झिझक और मजबूरी को भांपकर राजू ने बिना संकोच किए अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और राजन के हाथ पर रख दिए। “राजन, तुम रुकोगे नहीं। जाओ और अपनी किस्मत खुद बदलो,” राजू के इन शब्दों और रुपयों ने राजन को जैसे नए पंख दे दिए।
राजू चौरसिया से मिले उन रुपयों के सहारे राजन भोपाल पहुंचा। वहाँ उसने पूरे समर्पण और एकाग्रता के साथ परीक्षा पूर्व प्रशिक्षण केंद्र की प्रवेश परीक्षा दी, परिणाम आया, तो राजन की मेहनत रंग ला चुकी थी वह अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो गया था। 1 जुलाई 1982 का वह ऐतिहासिक दिन राजन के जीवन में एक नया सवेरा लेकर आया। इसी दिन उसने भोपाल के प्रशिक्षण केंद्र में कदम रखा। अब उसके हाथों में बीड़ी के पत्ते और तंबाकू नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की तैयारी के लिए मोटी-मोटी किताबें और नोट्स थे। रामदयाल के ताने अब बहुत पीछे छूट चुके थे।
राजन की आँखों में अब केवल एक ही लक्ष्य तैर रहा था,एक राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) बनकर समाज के इस शोषक तंत्र को बदलना और अपने ‘कर्मफल’ को एक नई और गौरवमयी दिशा देना है। इसके लिए
उसने रात दिन पढ़ाई शुरू की।
(शेष भाग कल)






