काव्य रत्न डॉ0 रामबली मिश्र, वाराणसी।
भ्रष्टाचार से मुक्ति
भ्रष्टाचार सदा अपसंस्कृति।
गंदे मन की य़ह दूषित कृति।।
विकृत अर्थवाद का द्योतक।
दानवीयता का संपोषक।।
भ्रष्ट आचरण रग रग में है।
ऊपर से नीचे तक में है।।
जब संकल्प स्वशासित होगा।
स्वस्थ भाव परिभाषित होगा।।
सामाजिक आवररण खिलेगा।
जब शासन का साथ मिलेगा।।
भ्रष्ट खून तन- मन में जबतक।
भ्रष्टाचार मिटे नहिं तबतक।।
भ्रष्टाचार मिटाना है तो।
संस्कार को जिवित कर तो।।
तब समाज शिव- आलय होगा।
स्वच्छ -पाक मन-आलय होगा।।







