काव्य रत्न डॉ0 रामबली मिश्र, वाराणसी।
नानी का घर
नानी का घर स्वर्ग है, अति मनमोहक द्वार।
नीम वृक्ष की छाँव है, आम फली रसदार।।
प्रकृति मनोहर प्रियमयी, रम्य मनोरम गाँव।
नानी के घर में सदा, सहज स्नेह का भाव।।
मामा देते स्नेह अति, करते मान – दुलार।
आँगन में मामी खड़ी, करती हैं सत्कार।।
नानी के घर में सदा, खुशियों की बौछार।
हँसी – खुशी में दिन कटे, मिले हमेशा प्यार।।
गुटवंदी होती नहीं, सहज परस्पर मेल।
बहुत बड़े इस गाँव में, सदा स्नेह का खेल।।
अगल- बगल बाजार में, मिलते सब सामान।
स्टेशन उन्नत है यहाँ, कोलाहल का भान।।
मन लगता है अत्यधिक, कुछ भी नहीं आभाव।
मामी- मामा का बहुत, कोमल मृदुल स्वभाव।।
एक माह तक मैं रहा, मन में अति उत्साह।
दिनचर्या अतुलित सुखद, दिल में मधुर प्रवाह।







