भारतीय संस्कृति का अनुपम एवं दिव्य उत्सव गुरुपूर्णिमा

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विजय कुमार शर्मा

 

 

भारतीय संस्कृति का अनुपम एवं दिव्य उत्सव गुरुपूर्णिमा

 

 

 

गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक दिव्य उत्सव है, जो श्रद्धा, समर्पण और ज्ञान के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह दिन केवल एक पर्व नहीं, अपितु हमारी सनातन परंपरा की आत्मा है, जहाँ ‘गुरु’ को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य माना गया है —

 “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।

 गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥”

 

प्राचीन काल में गुरु पूर्णिमा

गुरु पूर्णिमा का मूल उत्सव वेद व्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। महाभारत, 18 पुराणों और वेदांत-दर्शन के रचयिता ऋषि व्यास को ‘आदि गुरु’ माना गया।

इस दिन शिष्यों द्वारा गुरु के चरणों में श्रद्धा निवेदन कर ज्ञान की दीक्षा ली जाती थी। गुरुकुल परंपरा में यह पर्व अत्यंत महत्व रखता था — विद्यार्थी पूरे वर्ष की साधना का मूल्यांकन इस दिन गुरु के समक्ष प्रस्तुत करते थे।

 

गुरु- शिष्य परंपरा की विशेषताएँ

प्राचीन भारत में गुरु का स्थान माता–पिता से भी ऊपर माना गया। गुरु संदीपनि-श्रीकृष्ण, विश्वामित्र-राम, वशिष्ठ-भरत, द्रोणाचार्य-अर्जुन जैसे अनेक दिव्य संबंधों ने इस परंपरा को युगानुयुग जीवित रखा।

गुरु का कार्य केवल शिक्षा देना नहीं, अपितु शिष्य को जीवनमूल्यों, अनुशासन और आत्मबोध से जोड़ना होता था।

 

मध्यकाल में परिवर्तन

जब भारत पर विदेशी आक्रमण हुए और गुरुकुल प्रणाली खंडित हुई, तब भी गुरुओं ने परंपरा को आश्रमों और मठों में जीवित रखा।

संत कबीर, तुलसीदास, मीराबाई, गुरु नानक आदि भक्त संतों ने ‘गुरु’ को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना —

 “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।

 बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”

 

वर्तमान युग में गुरु पूर्णिमा

आज के समय में गुरु पूर्णिमा विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और आध्यात्मिक संगठनों में धूमधाम से मनाई जाती है।

हालांकि शिक्षा का स्वरूप डिजिटल और तकनीकी हो गया है, परन्तु गुरु के बिना ज्ञान की पूर्णता नहीं मानी जाती। आज के शिक्षक, मार्गदर्शक, कोच, और आध्यात्मिक संत सभी गुरु की भूमिका निभा रहे हैं। इस्कॉन, रामकृष्ण मिशन, आर्ट ऑफ लिविंग जैसे संस्थानों ने इस पर्व को वैश्विक पहचान दिलाई है।

 

 समस्याएँ और चुनौतियाँ

आज के युग में गुरु–शिष्य संबंध में आत्मिक गहराई कम होती जा रही है। शिक्षा व्यवसाय बन गई है और श्रद्धा तकनीकी अनुबंध में बदल गई है।

वर्तमान समाज में आवश्यकता है कि गुरु पूर्णिमा केवल औपचारिक आयोजन न रह जाए, बल्कि उसमें पुनः वही आध्यात्मिक ओज, अनुशासन और संस्कार जागृत हो।

गुरु पूर्णिमा केवल एक दिन का आयोजन नहीं, अपितु जीवनदर्शन है। गुरु के बिना आत्मज्ञान असंभव है।

आज के भटके समाज, दिशाहीन युवाओं और मूल्यविहीन शिक्षा में गुरु तत्व ही सच्चा प्रकाश बन सकता है। इस गुरु पूर्णिमा पर हम अपने जीवन में गुरु की सत्ता को पहचानें, उन्हें नमन करें और स्वयं भी एक प्रकाशपुंज बनने का संकल्प लें।

(विनायक फीचर्स)

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