राजेन्द्र रंजन गायकवाड़
सेवानिवृत्त जेल अधीक्षक
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
प्रेम पच्चीसा ( भाग 9)
रोहन की आँखें मोबाइल स्क्रीन पर टिकी हुई थीं, जैसे कोई जादूगरनी का जादू उसे बाँधे हुए हो। मुंबई की इस हलचल भरी रात में, उसके छोटे से अपार्टमेंट में सिर्फ़ घड़ी की टिक-टिक और दूर से आती ट्रैफिक की आवाजें थीं। वह सोफे पर बैठा था, कॉफ़ी का मग ठंडा हो चुका था, लेकिन उसका मन अभी भी उसी रहस्यमयी फोन कॉल के इंतज़ार में अटका हुआ था। “कौन होगा वो? क्या ये वो मौका है जो मेरी ज़िंदगी बदल देगा?” वह खुद से बुदबुदाया।
अचानक, फोन की रिंगटोन बज उठी। स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था। रोहन का दिल धड़क उठा। उसने झिझकते हुए कॉल रिसीव की। “हैलो?” उसकी आवाज में उत्सुकता और डर का मिश्रण था।
दूसरी तरफ से एक गहरी, रहस्यमयी आवाज आई, “रोहन जी, मैं बोल रहा हूँ राजेश मेहता, बॉलीवुड के बड़े प्रोड्यूसर। आपकी कविताएँ पढ़ीं, खासकर वो ‘खोई हुई रातें’ वाली। हमें एक फिल्म के लिए गीतकार चाहिए। क्या आप इंटरेस्टेड हैं?”
रोहन की साँसें थम गईं। ये वही मौका था जिसका वह इंतज़ार कर रहा था! लेकिन तभी उसके मन में माया और राशि की तस्वीर उभरी। माया, जो भोपाल में अकेली राशि की परवरिश कर रही थी और राशि, जो हर शाम पापा की कहानियाँ सुनने के लिए तड़पती थी। “क्या मैं ये सब छोड़कर मुंबई में रह सकता हूँ? परिवार के बिना ये सफलता का क्या मतलब?” उसका अंतरद्वंद्व और गहरा हो गया। बरबस आँखों से आँसू टपक गए सोचने लगा जीवन में हर कदम पर परीक्षा है। कोई कितनी भी पढ़ाई कर ले पर परीक्षा के दिन कुछ प्रश्नों के उत्तर भूल ही जाता है।
वह कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “सर, मुझे थोड़ा सोचने का समय दीजिए।” कॉल कट गई, लेकिन रोहन की रात अब और लंबी हो गई। अगले दिन सुबह, वह एयरपोर्ट की ओर निकला। शायद भोपाल लौटने का समय आ गया था या फिर ये कॉल उसे नई दिशा देगी? लेकिन रास्ते में एक और इम्तहान इंतज़ार कर रहा था – माया का मैसेज: “रोहन, राशि बीमार है। जल्दी आओ।”
अब रोहन के सामने दो रास्ते थे: सपनों की मुंबई या परिवार की भोपाल । क्या वह दोनों को जोड़ पाएगा, या कोई बलिदान देना पड़ेगा? ज़िंदगी का प्रेम पच्चीसा अभी जारी है…
( क्रमश : भाग 10 )







