रंजन गायकवाड़
(सेवानिवृत्त जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
प्रेम पच्चीसा ( भाग 14 )
माया और मालती के प्रयासों से बाल संप्रेषण गृह में न केवल बच्चों का व्यवहार सुधर रहा था, बल्कि उनकी रचनात्मकता भी उभरकर सामने आ रही थी। साप्ताहिक हस्तलिखित समाचार पत्र, जिसे बच्चों ने “सपनों की नई उड़ान” नाम दिया था, अब गृह के हर कोने में चर्चा का विषय बन चुका था। इस समाचार पत्र में बच्चे अपनी कविताएँ, कहानियाँ, चित्र, और यहाँ तक कि अपने अनुभव और सपनों को भी साझा करते थे। हर अंक में कुछ नया और प्रेरणादायक होता, जो न केवल बच्चों को, बल्कि गृह के कर्मचारियों और आगंतुकों को भी प्रभावित करता था।
केंद्रीय जेल अधीक्षक, श्रीमान राजेंद्र रंजन ने “सपनों की नई उड़ान” का तीसरा अंक देखने के बाद माया और मालती को अपने कार्यालय बुलाया। उन्होंने गर्मजोशी से दोनों की तारीफ की और कहा, “आप दोनों ने इन बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को निखारने का जो काम शुरू किया है, वह वाकई काबिले-तारीफ है। इसलिए आदर्श समाज स्वप्न साकार संस्था का यह काम समाचार पत्र सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि इन बच्चों की नई शुरुआत का प्रतीक है।”
रोहन, जो अब संप्रेषण गृह में एक साल बाद मेहता जी का अनुबंध पूरा करके नए विश्वास के साथ वापस भोपाल आकर माया और मालती के प्रयासों से बेहद प्रभावित होकर उनकी संस्था से जुड़ जाता है।
रोहन ने देखा कि बच्चे अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वास से भरे हुए थे। एक दिन, समाचार पत्र की साप्ताहिक बैठक में, रोहन ने एक विचार सुझाया। “माया दीदी, मालती दीदी, क्यों न हम इस समाचार पत्र को गृह के बाहर भी ले जाएँ? इसे आसपास के स्कूलों और समुदाय में बाँटा जाए, ताकि लोग इन बच्चों की कहानियाँ पढ़ें और समझें कि वे भी समाज का हिस्सा हैं।” इस से बच्चों की आत्म निर्भरता बढ़ेगी साथ कुछ आर्थिक सहयोग भी प्राप्त होगा।
माया और मालती को यह विचार बहुत पसंद आया, लेकिन उन्हें यह भी पता था कि इसके लिए और संसाधनों की जरूरत होगी।
रोहन के साथ मिलकर एक योजना बनाई। माया ने स्थानीय स्कूलों से संपर्क किया, जबकि मालती ने कुछ सामाजिक संगठनों और दानदाताओं से मदद माँगी। रोहन ने बच्चों के साथ मिलकर समाचार पत्र को और आकर्षक बनाने के लिए डिज़ाइन और सामग्री पर काम शुरू किया।
कुछ ही हफ्तों में, “सपनों की नई उड़ान” का पहला मुद्रित संस्करण तैयार हो गया। बच्चों ने इसे देखकर खुशी से उछल पड़े। समाचार पत्र अब रंगीन पन्नों, चित्रों और बेहतरीन कहानियों से सजा हुआ था। स्थानीय स्कूलों में जब इसे बाँटा गया, तो शिक्षकों और छात्रों ने इसे बहुत सराहा। एक स्कूल की प्रिंसिपल, श्रीमती मृदुला पांडे अपने पति विजय पांडे जी , जो वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार के साथ संप्रेषण का भ्रमण किया, ताकि वे अपनी स्कूल चलाने की संघर्ष कहानी और अनुभव साझा कर सकें।
सुधारात्मक परिवर्तन देखकर आदतन अपचारी बच्चा, श्याम, जो पहलेर गुस्सैल और नशेड़ी था, ने अपने लेख में अपनी माँ के लिए एक कविता लिखी। उसकी कविता पढ़कर माया की आँखें नम हो गईं। श्याम ने पहली बार अपनी भावनाओं को इतने सुंदर ढंग से व्यक्त किया था। माया ने उसे गले लगाया और कहा, “श्याम, तुमने आज साबित कर दिया कि तुम्हारे अंदर कितना बड़ा दिल है।”
जैसे-जैसे “सपनों की नई उड़ान” की प्रसिद्धि बढ़ती गई, सुधार गृह में और भी बदलाव आने लगे। बच्चे अब न केवल समाचार पत्र के लिए लिखते, बल्कि नाटक, गायन, और चित्रकला जैसी गतिविधियों में भी हिस्सा लेने लगे। रोहन ने एक नया सुझाव दिया कि क्यों न बच्चों को स्थानीय समुदाय के लिए कुछ करने का मौका दिया जाए, जैसे कि पौधरोपण या सफाई अभियान। माया और मालती ने इस विचार को तुरंत स्वीकार किया।
एक दिन, जब बच्चे संप्रेषण गृह के बगीचे में पौधरोपण कर रहे थे, वहाँ के नामी गिरामी निर्भीक पत्रकार रमाकांत पांडे जी ने उनकी तस्वीरें लीं और उनकी कहानी श्री कुछवाहा जी ने अपने अखबार आकाश पथ में छापा। यह खबर देखकर न केवल सुधार गृह के बच्चे, बल्कि माया, मालती और रोहन भी गर्व से भर उठे। अब सवाल यह था कि इस नई शुरुआत को और कैसे आगे नियमित रूप से बढ़ाया जाए, ताकि ये बच्चे समाज में अपनी जगह बना सकें और अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ सकें।
माया और मालती के बाल प्रेम से कहानी आगे क्या मोड़ लेगी? क्या माया, मालती और रोहन बच्चों को समाज से जोड़ने में और कामयाब होंगे, या कोई नई चुनौती सामने आएगी?
(भाग 15)
राजेंद्र रंजनगायकवाड़







