डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या, (उ0प्र0)
त्रिपदियाँ
भोली सूरत पे मत जाना,
इसका कोई नहीं ठिकाना।
मालिक,इससे सदा बचाना।।
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कलियों में आते तरुणाई,
भौरों ने गुंजन-धुन गाई।
मधु-रस चख कर लें अँगड़ाई।।
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दुर्जन की संगति मत करना,
तुमको कष्ट भले हो सहना।
सुनो,नीति का है यह कहना।।
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संत-समागम सुख अति देता,
मूल्य नहीं बदले में लेता।
संत-समागम सुबुधि-प्रणेता।।
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सुंदर सोच,कर्म नित शुभकर,
ऐसी प्रकृति सदा हो हितकर।
टिका विश्व शुचि चिंतन बल पर।।
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राजनीति का खेल निराला,
आज शत्रु कल मीत हो आला।
पड़े न गठबंधन से पाला ।।







