काव्य रत्न डॉ0 रामबली मिश्र, वाराणसी।
कपट का खेल
खेल चल रहा कपट का, आयी जग में बाढ़।
आज सत्य का पंथ है, लगता सबको गाढ़।।
कपटी का मेला लगे, लूट रहे हैं लोग।
सच्चाई की राह को, लोग समझते रोग।।
मन कुत्सित अब हो गया, हुई शिष्टता लुप्त।
मानस में विष है भरा, अमृत आज विलुप्त।।
मीठी वाणी बोलकर, करते सभी कुचाल।
कपट- कुरंगी मनुज का, यह गंदा है हाल।।
धोखा देना बहुल है, सदा अनैतिक खेल।
मानवता को कुचल कर, चाह रहे सब मेल।।
घटियापन की है लहर, धोखा देना काम।
मरा हुआ विश्वास है, मन में पाप विराम।।
निर्मलता गायब दिखी, उर में रहता मैल।
कुंठित मानव पतल पर, करती नृत्य रखैल।।
ऊपर से हाँ- हाँ करें, पीछे से आघात।
कपटी रहे फिराक में, सदा लगाये घात।।







