प्रो.(डॉ.) मंजू वर्मा,
(रिटायर्ड प्रोफेसर पंजाब विश्वविद्यालय) चंडीगढ़।
झील के किनारे
चंडीगढ़ की सुखना
झील के किनारे
डेढ़ सौ साल पुराना
वो पीपल का पेड़
ज्यों का त्यों खड़े
हमारे प्रेम की गाथा
…..दोहराता है!
इसकी झुकी डालियां
झील के पानी से
अठखेलियां करती
इतराती-लहलहाती
अतीत के पन्नों को
उलटती- पलटती दिखाई देती हैं
पेड़ के तने पर उकरा
वो मेरा और तुम्हारा नाम
चाहे वक़्त के साथ
धूमिल हो गया……
लेकिन,,,,
वर्षों बाद उसके स्पर्श का स्पंदन
एक अद्भुत कम्पन बन
रूह में उतर गया
स्मृति के मानस पटल पर
तुम्हें समक्ष खड़े पाया
जिसे चाह कर भी पकड़ न सकी
तुम्हारी आकृति का लावण्य
झील के आभामंडल को
लावनित कर गया
पुष्प महकने लगे,
परिंदे चहकने लगे,
भंवरे गुंजायमान हो गये…..
ढलते सूरज का सुरमई प्रतिबिंब
झील के पानी में हिचकोले खाता
मानो झूला झूल रहा हो
वर्षों बाद,,,,
ऐसी मनोरम छटा देख
तुम्हारी यादों की तपिश
राख में दबी चिंगारी सी
सुलगकर मुखरित हो
भीतर की विरहाग्नी को
प्रज्ज्वलित कर गई….!!
यह कविता मेरे काव्य संग्रह ” हम फिर मिलेंगे ” में संकलित की गई है।







