डॉ. हरि नाथ मिश्र, अयोध्या,उ.प्र.।
तबाही (दोहे)
बड़ी तबाही मच गई, फटा ग्लेशियर आज।
प्रकृति हो गई रुष्ट अब, देख मनुज के काज।।
यह प्रकोप है अति प्रबल, हिम-नद किया तबाह।
जन-धन की यह हानि लख, निकले हर मुख आह।।
देव-भूमि को क्या हुआ, है यह कैसा रोग?
अब औषधि है खोजनी, तज कर भौतिक भोग।।
पर्वत-वन-हिम-नद-नदी, सभी हमारे मीत।
इन्हें रखें महफ़ूज़ हम, ये जीवन-संगीत।।
इनकी पूजा-अर्चना, ही तो अपना धर्म।
रक्षा इनकी हम करें, है पुनीत यह कर्म।।
शुभ चिंतक है प्रकृति यह, है जीवन-आधार।
इसे न छेड़ें हम कभी, दें हम इसको प्यार ।।
प्रकृति शक्ति का स्रोत है, और देव का वास।
अन्न-वायु-जल-दायिनी, करें सभी विश्वास।।
(उत्तराखंड, चमोली-त्रासदी)







