डॉक्टर रामबली मिश्र, वाराणसी, (उ. प्र.)
उसको क्या कहें?
बनता है चालू बहुत, करता है बकवास।
अपने को अच्छा कहे, दूजे का उपहास।।
ज्ञान नहीं उसमें दिखे, केवल वह बातून।
सिर्फ प्रदर्शन कर रहा, खाता रोटी- नून।।
खुद को पूँजीपति कहे, किन्तु दरिद्र निवास।
जलता देख पड़ोस का, होता देख विकास।।
नजदीकी बनता रहे, किन्तु न आये काम।
बदनामी का भय नहीं, अच्छा हर इल्जाम।।
केवल कुटकी काटता, रहता मन में दम्भ।
कहता अपनेआप को, इस दुनिया का खम्भ।।
धोखा दे कर चुप रहे, करे न कोई बात।
मन में नहीं मलाल है, करे भले आघात।।
दिल में रहती कालिमा, ऊपर से मुस्कान।
अद्भुत स्वार्थ प्रवीण मन,चाह रहा सम्मान।।
अवसरवादी कटु गरल, है ‘मकार’ मक्कार।
मन मैला मानस मृतक, धिक धिक धिक धिक्कार।।







