लेखिका/कवयित्री
सुश्री सरोज कंसारी, नवापारा राजिम
रायपुर(छ. ग.)
प्रेरक विचार
बचत
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सरजू नाम का एक किसान था, वह एक छोटे
से गाँव में रहकर खेती किसानी करता था। वह
दिन-मेहनत करता था और मौसम के अनुसार
फसल उगाता।
धान की अच्छी फसल होने पर उसे मंडी में बेचकर जब घर आता तो कुछ रुपए अपनी गुल्लक में डाल देता, बाकी घर में घर का खर्च चलाता, उसमें से जो बचता अपनी पत्नी को भी देता। उसकी बेटी मुनिया रोज देखती पिताजी गुल्लक में पैसे जमा करते हैं।
वह भी ले आई गुल्लक मां उसे खर्च के लिए जो पैसे देती, उसे वह अपने गुल्लक में भर देती ।ऐसे करते लगभग पांच वर्ष गये, एक साल मौसल की खराबी से फसल चौपट हो गया, घर में आर्थिक समस्या आ गई, जो रुपए जमा किए उसे भी सरजू ने खर्च कर दिए।
एक दिन उसकी पत्नी की तबियत बहुत खराब हो गई उसके पास डॉक्टर पास ले जाने के लिए पैसे नही थे। उसने अपनी बेटी को कहा-मुनिया तुम माँ का ध्यान रखना, मैं किसी से रुपये का इंतजाम करके आता हूं, फिर किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाना हैं। बेटी ने कहा– थोड़ी देर रुकिए ! फिर अपनी गुल्लक लेकर आई और कहा- पहले देख लीजिए, शायद इसमें कुछ रुपये काम आ जाएं। पहले तो वे नही माने पर बेटी की जिद पर जब गुल्लक फोड़कर देखे तो उसमें से लगभग चार हजार रुपये निकले। वे तुरंत पत्नी को हॉस्पिटल लेकर गये, और उसी रुपए से दवाई भी लेकर आए। घर आकर कहा- जमा पूंजी से आज हमें बहुत सहयोग मिल गया फिर उसने अपनी बेटी से पूछा—- तुम्हारे पास इतने रुपये कहाँ से आये? तब मां ने बताया—जब आप मुझे खर्च के लिए देते थे उसमें से बचाकर मैं मुनिया को देती, और वह अपने पैसों को बचाकर गुल्लक में भरती, इस तरह हो जमा हो गया।
‘नया अध्याय’ समाचार पत्र, देहरादून
सरजू बहुत खुश हुए कहा-मुझे नही पता था मेरी पत्नी और बच्ची में भी बचत का गुण हैं। मैं धन्य हो गया, आज समझ आया फालतू खर्च न कर अगर हम रोज थोड़ा बचत करे तो वह विपत्ति के समय सहारा होता है। हर माता-पिता को अपने बच्चों में बचत की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए, जो आज के समय में बहुत ही आवश्यक है।।
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