जीवन के सफर में इंसान, कभी भीड़ से परेशान तो कभी अकेलेपन से व्याकुल होता है।

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लेखिका/कवयित्री

सुश्री सरोज कंसारी

नवापारा राजिम, रायपुर, छत्तीसगढ़।

 

 

 

                             आलेख

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जीवन के सफर में इंसान, कभी भीड़ से परेशान तो कभी अकेलेपन से व्याकुल होता है।

 

जीवन का चाहे कोई भी मुकाम हो हर इंसान को भावनात्मक लगाव, सहयोग, सांत्वना, सहानुभूति प्रेम-स्नेह, दया-क्षमा, करूणा और अपनो के प्रेम की जरूरत होती हैं। चाहे बचपन जवानी या बुढ़ापा हो आत्मीय स्पर्श के बिना सब व्यर्थ हैं। भौतिक सुख- सुविधा को अक्सर हम महत्व देते हैं जिसके लिए अपनो से दूरी बना लेते हैं। जरा सोचिए ! जिस धन- दौलत, शौहरत जमीन- जायजाद के लिए अपनो से दुर्व्यवहार कर दुत्कार कर उपेक्षित कर हम अकेले रह जाते हैं। क्या अपने दुख पल में उस बंगले- गाड़ी सोना चांदी को गले लगा सकते अपने मन की व्यथा कहकर खुद को संभाल सकते हैं? है शायद नहीं। पर जीते जी हम क्यों घमंड में चूर हो जाते हैं भूल जातें हैं अपनो को। रिश्ते कोई भी हो उन्हें कभी रुलाना नहीं चाहिए।

जीवन का पथ कठिन है और सभी के साथ रहकर ही हमें विभिन्न अनुभव मिलते हैं। मानवीय गुणों के बिना मनुष्य जीवन का कोई अस्तित्व नहीं। कभी- कभी हम अपने ही बुरे कर्मो से सब कुछ खो देता है। रिश्तों को बनाए रखने के लिए दिखावे की नहीं हृदय से उन्हें समझने की जरूरत होती है। वैसे तो अकेले आएं हैं और अकेले ही जाना है लेकिन इस बीच सांसारिक जीवन में रहकर अपने फर्ज और कर्ज से जुड़े होते हैं जीते जी इनसे हम मुक्त नहीं रह सकते। रीति- रिवाज, नियम-कानून जीवन निर्वहन के लिए प्रथम शर्त है। मिलकर हम एक दूसरे के सहयोग से ही पारिवारिक समाजिक, धार्मिक राष्ट्रीय और विश्व स्तर पर जीवन को जीने योग्य बनाकर- उनकी संरचना इस प्रकार करते हैं की एक अनुकूल सुखद वातावरण सभी को मिल सकें। जिससे सभी अपने व्यक्तित्व का विकास कर सके।

आज आधुनिक जीवन शैली में लोगों की भाषा-बोली, व्यवहार रहन- सहन सभी में बदलाव हुए हैं। अपने बल- बुद्धि विद्या के प्रयोग से बहुत कुछ पा लिए हैं। व्यस्त जिंदगी हैं किसी न किसी काम के लिए भागदौड़ से भरी है जिंदगी। भीड़ बहुत है जिधर देख उधर हर तरह के लोग अस्त व्यस्त अवस्था में है। लाखों करोड़ों लोग हैं किसी कार्य के लिए एकत्रित हैं पर अगर उनके आपसी समझदारी सामंजस्य नहीं तो वहां घुटन ही होती है शोर में एक दूसरे को सुन नहीं पाते आज सर्वत्र वही स्थिति है। खुद को कोई सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं, डर है, घबराहट हो रही है जरा सोचिए! हम लोग भीड़ से जल्दी निकलना क्यों चाहते हैं। क्योंकि वहां किसी को किसी की परवाह नहीं । सभी को अपने गंतव्य तक जाने की जल्दी होती है वहां वे किसी की सुविधा-दुविधा को नहीं देखते। अगर हम उस भीड़ से निकलने की कोशिश न किए तो से लापरवाही और भगदड़ में दब जाएंगे। लोग कुचलकर निकल जाएंगे।

इस बात पर जरा ध्यान दिजिए जहां भीड़ है अपने नहीं, वहां असुरक्षा का भाव होता हैं। इसलिए हर इंसान को जीने के लिए अपनो की उनके अपनेपन की जरूरत होती है। अपनो के बीच आपसी संवाद होते हैं सुलह करते हैं सुनते हैं उनकी समस्या का सामाधान होता है कुछ गलत फहमी तनाव मन मुटाव से छोड़िए मत अपनो को धन दौलत से भी ज्यादा महत्व रखते हैं। मित्रवत रहिए, निश्छल पवित्र और सद्भाव रखिए। यही जीवन का असली सौंदर्य हैं। आज सबसे ज्यादा जख्मी लोग अपनो से हैं। अपनो से दूर हो जाना इंसान की सबसे बड़ी हार हैं। सब जीत कर भी अगर हम अपनो के दिल में जगह नहीं बना पाएं तो यह हमारा दुर्भाग्य ही हैं। गैरों से क्या उम्मीद वो तो हमें जानते नहीं और कुछ भी कह देते हैं ? लेकिन जो अपने हैं अगर वे न समझें और उनके साथ रहकर हमें अकेलापन महसूस हो तो बहुत दुख होता हैं। आज अपनो के लिए ही दिल में कोई एहसास नहीं।

जीवन के सफर में इंसान कभी भीड़ से परेशान तो कभी अकेलेपन से व्याकुल होता है। मन की अनंत व्यथाओं के बीच खुद को संभाल पाना, हर समय संयमित और मर्यादित रह पाना का पाना वाकई कठिन होता है। बहती हुई इस जीवन धारा में चंचल मन को नियंत्रित न करने से बहुत नुकसान होता है। मानव मन की गहराई में कई रहस्य होते हैं जो जीवन भर साथ रहते हैं और उसी के साथ कभी-कभी अंत हो जाता हैं। मन की बात को हम किसी से कह नहीं पाते। पता नहीं किसी वेदना को लेकर वे कितने साल यूं ही गुजार देते हैं। पर कभी समय- माहौल, परिस्थित और वो व्यक्ति ही नहीं मिलते जो करीब हो, अपनी हर बात बिना किसी संकोच के जिसे कह सके।

आज अपने आसपास ही बहुत से लोग ऐसे दिख जाएंगे जिनके रिश्ते-नाते, सगे- संबंधियों की भीड़ हैं। परिवार में सभी हैं। जो हर दृष्टि से सुखी- संपन्न होने के बाद भी एकाकी जीवन का जीने के लिए मजबूर हैं। कभी हम महसूस भी करते हैं और सोचते हैं- जिनके चार- पांच बेटे हैं। बहू हैं बेटी और दामाद के साथ नाती- पोते सभी हैं लेकिन वे खुश नहीं क्यूं ? उनकी आंखों में आसूं हैं इंतजार हैं, कुछ उम्मीद है, एक कोने में बैठे हैं, चेहरे में हंसी नहीं।एक उदासी के घेरे में हैं कोई चाहत उत्साह और ख्वाब नहीं हैं। बहु कुछ कहना चाहते हैं, पर सुनने वाले कोई नहीं।

अपने ही तरस रहे अपनेपन के लिए, आभाव से गुजर रहे।पर अपनो की फिकर छोड़कर देश-दुनिया, सोशियल मिडिया में प्रसिद्धि पाने के लिए लगे हैं। दिखावे के लिए दया-दान, धर्म और सहानुभूति जता रहें हैं। परिवार में ही ऐसे कई सदस्य हैं जो एक दूसरे से मीठे बोल, और बहुत सी अपेक्षाएं पालकर रखे हैं लेकिन उनके पास समय नहीं। यही कारण है कि वे अपनी मानसिक थकान मिटाने के लिए अपनी एक अलग राह ढूंढते हैं कभी भटक जाते हैं गलत दिशा में चले जाते हैं दूसरो के बहकावे में आ जाते हैं और अच्छे भले सीधे सच्चे होकर भी कभी अपनी जिंदगी नहीं जी पाते अपनो के लिए तरसते ही रहते हैं।

जो समय के साथ अपनो को खो दिए हैं सदा के लिए।जिनके परिवार में कोई नहीं अकेले रह गए हैं, उन्हें तो मजबूरी है। वे ही जानते हैं कैसे गुजारा कर रहें हैं ? दिन भर सोचते यादों में खोए रहते अपने बीते दिन को याद करते कभी खुद को सांत्वना देते और सहलाते हैं अपने भावुक मन को। समझाते हैं। वे समझौता कर लेते हैं अपनी किस्मत से समय के साथ जीना भी सीख ही जाते हैं आगे बढते हैं लेकिन जीवन भर अपनो की कमी बनी रहती है कभी रोते हैं दुखी होते हैं पर खुद आंसू पोंछ लेते हैं। जिन्हें कभी अपनो का प्यार मिला था आज कोई नहीं वे ही जानते हैं परिवार की कीमत अपनो की खुशी उनका सम्मान पर आज तो स्थिति बहुत दयनीय हैं अपनो के होते हुए भी तन्हा गुजार रहे हर पल।

सांसारिक जीवन में बहुत से रिश्ते नाते होते हैं चाहे वे अपने हो या बेगाने। जो हर पल हमें महसूस कराते हैं अपने होने का, उनका सानिध्य हर किसी को प्रिय होता हैं। रिश्ते के साथ ही जिंदगी चलती हैं और जिनसे जुड़े होते हैं उनके अच्छे बुरे व्यवहार का प्रभाव पड़ता ही हैं। कई बार लोग दुनिया के मोह- माया और हर बंधन से खुद को अलग रखते हैं और कहीं दूर जाकर अकेले रहते हैं। किसी प्रकार मानसिक तनाव को सहन कर पाने कष्ट से छुटकारा पाने के लिए वे हर किसी से दूरी बनाने में ही भलाई समझते हैं।

झूठ धोखे, मतलबी, स्वार्थी और दिखावे के रिश्ते से जब मन भर जाता हैं तब ही कोई अलगाव की स्थिति में आते हैं। अपनो के प्रति ही जब हम जिम्मेदारी नहीं निभा रहे हर पल वे तकलीफ में हैं और कोई पूछने वाले न हो तो भी मन टूट जाता हैं लापरवाही पारिवारिक भाव की कमी मनमुटाव के कारण भी आज लोग जुड़कर रहना पसंद नही करते। तन्हा जीवन का। सफर सच में मुश्किल होता हैं लेकिन साथ रहकर कोई छल करें तो उसका दर्द अधिक होता हैं।

अकेलेपन आज के समय में सबसे अधिक चिंता का विषय बनता जा रहा है जरा सी बात पर क्रोधित होकर उनसे झगड़े विवाद बहस कर अपनी से दूरी बना लेना भले ही उस समय अच्छा लगता है सहन का। लेने से बहुत सी समस्याएं हल हो जाती हैं नाराजगी ठीक हैं लेकिन नफरत मत किजिए चाहे कोई कैसे भी रहे कोशिश किजिए जुड़े रहने की टूटने से कभी कभी जिंदगी में शून्यता आ जाती हैं।

आपस में किसी भी बंधन में रहने से कई प्रकार की उनसे। इच्छाएं जरूरत जुड़ी होती हैं लेकिन साथ रहकर भी कोई रिश्तों का। मूल्य न समझे बात बात पर अपमानित कर। उन्हें सताए बेवजह उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करे तो एहसास अपनेपन के भी धीरे धीरे कम होने लगते हैं।

हर इंसान के जीवन में समस्या होती हैं, जो आती जाती रहती हैं। लेकिन सबसे जरूरी होता है आपका मनोबल उसे मजबूत रखिए। ज्यादा सोचकर बीमार रहने से अच्छा है जैसे हैं, जहां- जहां, जो है उसी में संतुष्ट और खुश रहने की कोशिश कीजिए।अकेले, कभी- कभी हम अपनी ही मानसिकता से हो जाते हैं। कौन अच्छे या बुरे हैं? इस पर ज्यादा गहन चिंतन की बजाएं खुद सभी को अच्छी सोच और व्यवहार दें। भूलकर शिकायत रिश्ते सच्चे दिल निभाइए, चाहे कोई भी क्षेत्र हो मिलनसार बनिए। जो हर किसी के स्वभाव को समझने की कोशिश करते हैं, उनके दुख- सुख में सहभागी होते हैं, समस्या को सुलझाते हैं, मन की बात कहते हैं, एक दूसरे का सम्मान करते हैं। वे हर जगह अच्छे माहौल का निर्माण कर लेते हैं, ऐसे लोग कभी अकेले नहीं होते।

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