डॉ. सीमा विजयवर्गीय
एम.ए. (हिंदी व संगीत),
पी-एच.डी.-(राजस्थान वि.वि),
बी.एड. शैक्षणिक,
अलवर, राजस्थान
वो इक मसला ही सालों-साल है जब
नहीं हाथों में रोटी-दाल है जब
अकालों में ही मर जाएगा होरी
नज़र बादल की फिर से लाल है जब
यहाँ के बाग़ में क्या फूल होंगे
यहाँ सड़कों का ऐसा हाल है जब
बढ़ेगी रोज़ ही बेरोज़गारी
सियासत की ही गहरी चाल है जब
बुनेगी ख़्वाब कैसे ज़िंदगी ये
यहाँ जालों के भीतर जाल है जब
भला छेड़ेगा कैसे तान मीठी
वो दिल के साथ ही बेताल है जब
सताएँगी भला कैसे हवाएँ
बुना माँ का सुकोमल शाल है जब







