संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर, (मध्य प्रदेश)
(नया अध्याय, देहरादून)
गरम-धरम हुए अलविदा…!
गरम-धरम शर्मीले धर्मेंद्र कह गए अलविदा,
जिस पर सारी दुनिया थी दशकों से फिदा।
कभी सभी के दिल में समायें चुपके-चुपके,
हकीकत में दोस्ती निभा निकल गए दुबके।
क्या? फिल्मों के नाम गिनाऊ बंदा था नेक,
ज़ूल्म के खिलाफ फिल्मों में लड़ता हैं एक।
अनगिनत को देते अपनी फिल्मों में अवसर,
ही मेन ने कभी-भी न लिया श्रेय जिंदगीभर।
आगाज़ फिल्म हैं ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’,
65 सालों के सफ़र में हो गए करीब हमारे।
ना की सम्मान की आस अभिनय ही खास,
दर्शकों के दिलों पर राज करना आया रास।
कभी कहते रहते थे ‘पल-पल दिल के पास’,
हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे धरम आस-पास।
छिना गया ‘हक’ वापस लाने की देते प्रेरणा,
आज हमारी उनके प्रति दिलों में हैं संवेदना।
(संदर्भ-धर्मेंद्र के निधन पर श्रद्धांजलि)







