राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़।
गजल
अब क्या! कुछ नहीं, कोई नहीं,
दिल में सायबान-ए-ग़म ही नहीं।
वो जो थे कभी, घर के आसपास,
अब वो भी, हमारे हमदम ही नहीं।
हँसते थे जब, साथ साथ उनके हम,
अब वो लम्हे, वो हसीं गम ही नहीं।
चाँदनी रातें थीं, तारों भरी थीं आँखें,
अब वो ख्वाबों का, कारवाँ ही नहीं।
दर्द है, पर दवा माँगते शर्माते हैं हम,
आलम-ए-हमदर्दी, का आलम ही नहीं।
“ग़ालिब” कह गए, बात सदियों पहले,
वो शायर भी, हमारे मेहमान ही नहीं।
अब क्या! कुछ हलचल भी नहीं,”रंजन”
महज एक सन्नाटे के सिवा कुछ ही नहीं।
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)







