राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़।
(नया अध्याय, देहरादून)
धुंधली आँखों से, जमाने को देख रहा हूँ,
हर सूरत की सीरत, नजर आ रही है।
शराब की बोतलें, खाली हो गईं हैं सारी,
होश में आकर, असली चेहरा देख रहा हूँ।
सपनों के महल बनाए थे, रंग-बिरंगे कभी,
टूटे हुए खंडहरों को, बारीकी से देख रहा हूँ।
कसमें- वादे किए थे, कभी मीठी बातों में,
फ़रेब की मोटी परतें, उखड़ती देख रहा हूँ।
रिश्तों के ताने-बाने थे, उजली सी चादर में,
नंगी हक़ीकत, बेनकाब होते देख रहा हूँ।
आँसुओं ने धो डाली आँखों की धुंधलाई,
साफ नजर से हथेली की रेखाएं देख रहा हूँ।







