राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़।
(नया अध्याय, देहरादून)
सूखे – दरख़्त का दर्द बोनसाई पौधे क्या जाने ,
हवाओं की मार, जड़ों की बेचैनियां क्या जाने।
अंधड़ की लपटे चुभती हैं, सीने में वर्षों से,
पीली पड़ी पत्तियाँ की, जवानियां क्या जाने ।
सूरज की तपिश में, झुलसता है खुरदुरा तना ,
छाँव की परछाइयाँ , परेशानियां क्या जाने ।
झड़ते हुए पत्तों का रोना, कौन सुनेगा यहाँ,
बिछड़े पंछियों की, निशानियां क्या जाने।
ग़मों की रातें लंबी, सुबह के इंतज़ार में हैं,
खत्म हो जाएँगे ख़्वाब, टहनियां क्या जाने।
दिल में उग आए हैं, काँटे भी फूल बन कर,
मिट्टी के दर्द की, दबी कहानियां क्या जाने।







