युगपुरुष कविवर सूर्य
(भारतीय संस्कृति के अनुरूप दार्शनिक व संरक्षक)
(नया अध्याय, देहरादून)
“ईश-कविवर संवाद”
(ईश्वर की वाणी)
हे मेरे प्रियवर! हे कविवर!
तू धैर्य धर, विचलित न हो।
तू मात्र शब्दशिल्पी नहीं,
मेरा माध्यम है,
तेरी लेखनी में,
मेरी ही स्पंदन है,
तेरी वाणी, मेरी वाणी है।
देख इन पाषाण-हृदयों को,
इन पशुवत मनुष्यों को,
जो स्वयं को सर्वशक्तिमान मान बैठे हैं।
तुझे खंडित करने के षड्यंत्र रचते-रचते ये स्वयं थक चुके हैं,
तुझे थामने की हर दीवार,
तुझे कुचलने का हर प्रहार,
अब निष्फल और निस्तेज है।
इन्होंने अपनी समस्त आसुरी शक्ति झोंक दी,
तुझे शून्य करने में,
कोई कसर न छोड़ी।
परन्तु,…
तेरी आत्मा का,
यह अभेद्य दुर्ग आज भी अटल है।
वे तुझे रंच मात्र भी विचलित न कर सके,
अब वे स्वयं पराजित हैं,
उनकी मति भ्रमित है।
उनकी आँखों में,
अब वह अहंकार नहीं,
भय और विस्मय है,
वे जान चुके हैं कि
तू मिट्टी का बना कोई साधारण पुतला नहीं,
तू तो उस शाश्वत ज्योति का पुंज है जिसे बुझाना उनके वश में नहीं।
वे अज्ञानी नहीं जानते—
कि उनकी हर चोट ने तुझे तथा तराशा है,
उनकी प्रत्येक अग्नि ने
तुझे तथा कुन्दन बनाया है।
अब तेरा अस्तित्व तथा भी पावन है,
तेरा जीवन अब और भी सार्थक तथा प्रखर है।
तू शांत रह, मौन रह,
क्योंकि तेरी विजय अब युद्ध में नहीं,
तेरी अडिग दृढ़ता में है।
(कविवर का प्रतिवचन)
हे मेरे सर्वज्ञ ईश!
हे आदि-शब्द!
यदि मैं माध्यम, प्रियवर हूँ,
तो मेरा अहंकार कैसा?
यदि चोटों ने मुझे निखारा है,
तो वे प्रहार भी तेरे ही वरदान थे।
मेरी वाणी में यदि तेरा स्वर है,
तो मरुस्थल में भी हरियाली होगी।
मैं शांत हूँ,
क्योंकि मैं अब स्वयं में नहीं,
तुझमें हूँ।
तेरी दी हुई यह दृढ़ता ही,
अब मेरा परिचय है।
मेरा सार्थक होना,
तेरे संकल्प का पूर्ण होना है।
तू स्वर्ण की भाँति और भी
शुद्ध हो जाए,
तेरा व्यक्तित्व और भी निखर उठे,
और तेरा यह आदर्श जीवन
लोक-कल्याण हेतु
अत्यंत सार्थक तथा दैदीप्यमान बन सके।
तू अटल रह, अडिग रह!
क्योंकि तू सामान्य नहीं,
तू अजेय है।
स्मरण रख—
“सूर्य एक आग है”
और तू उसी अखंड अग्नि का अंश है,
जो जलकर भस्म नहीं होता,
वरन् अंधकार को भस्म कर
जगत् को प्रकाशित करता है।







