‘चेतना का शंखनाद’

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युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’

प्रखर आध्यात्मिक विचारक एवं साहित्यकार

संवाहक: भारतीय संस्कृति एवं मानवीय मूल्य

समाज-सुधारक एवं समरसता के उपासक।

 

 

(नया अध्याय, देहरादून)

 

‘चेतना का शंखनाद’

मौन उद्घोष —-
हे ईश्वर,
मेरे शत्रुओं की चिंता तुम त्याग दो,
उनसे तो मैं स्वयं निपट लूँगा।
मुझे पूर्ण बोध है—
क्या उचित है और क्या अनुचित,
मैं सब जानता हूँ, सब समझता हूँ।

परन्तु नियति की विडंबना तो देखो !
मेरे हाथ अक्सर उन्हीं कार्यों की ओर खिंचते हैं…
जिन्हें मेरा विवेक स्वीकार नहीं करता,
और वह सब अधूरा रह जाता है—
जिसे पूर्ण करने की मेरी तीव्र अभिलाषा थी।

मैं शत्रुओं से पराजित नहीं,
मैं तो स्वयं के भीतर एक ‘मौन’ युद्ध लड़ता हूँ।

यह दुनिया निष्ठुर है, पाषाण है, संवेदनशून्य है,
यहाँ स्वार्थ की आँधियों में करुणा के दीप बुझ चुके हैं,
जहाँ संवेदनाओं की कोई उर्वर भूमि शेष नहीं बची,
वहाँ मैं अपनी ही आत्मा के तप्त लहू से संवेदनाएँ सींचता हूँ।

मैं अपने ही अंतर्द्वंद्व में फँसा
वह पथिक हूँ, जो औरों को दिशा दिखाता है।

वास्तविकता तो यह है ईश्वर…
कि मैं इस गूँगे संसार की वाणी बना हूँ,
और अपनी चेतना की किरणों से,
इन सोते हुए मनुष्यों को जगाना चाहता हूँ।

 

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