राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(सेवा निवृत केन्द्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
गजल
सबने अपना – अपना फर्ज अदा किया,
मैने ही, अभी तक कुछ भी किया नहीं।
वक़्त ने जो लिखा, वो पढ़ लिया मैने,
किस्मत में क्या लिखा है, पढ़ा नहीं।
ख़्वाब टूटे तो टूटे, नींद तो आ गयी,
सुबह, जगाए कोई, ऐसा हुआ नहीं।
दर्द दिया जो उसने, दवा भी दी है,
अलग बात है, मरीज ठीक हुआ नहीं।
ज़ख़्म भरते हैं, धीरे-धीरे हर चोट के,
मेरी आहें से, कोई आहत हुआ नहीं।
सफ़र अपना था, अकेले ही चलता रहा,
किसी राह में, कोई कभी पुकारा नहीं।
आज ख़ुद से, एक सवाल बाकी है “रंजन”
खुल के बता, कौन सा जहर पिया नहीं।







