दोहे (मानव-मन)

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डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या

 

 (नया अध्याय, देहरादून)

 

दोहे (मानव-मन)

मानव-मन की तीव्र गति, जिसकी मिले न थाह।

पवन वेग पर्वत चढ़े, तन-मन भरे उछाह ।।

 

तन तो भारत में रहे, मन रहता जापान।

धन्य-धन्य मन तू विकट, तू है परम महान।।

 

मन का बल है आत्म-बल, जो ही है बल-मूल।

रहे आत्म-बल यदि सतत, मिटे सदा हिय-शूल।।

 

हार-जीत मन-हस्त है, मन-प्रभुता बेजोड़।

जो जग में मन-जीत है, रहे न उसकी तोड़।।

 

मन जिसके वश में रहे, उसका रहता नाम।

गीता का संदेश यह, कर्म करें निष्काम ।।

 

मन की शुचिता से कटे, भव-भय-कष्ट अपार।

शुद्ध सोच,मन-तृप्ति से, मिलता सुख-भंडार।।

 

रखे नियंत्रित जो इसे, समझ उसे बलवान।

देव-तुल्य मन-जीत वह, रखता सबका ध्यान।।

            

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