“अस्तित्व की गरिमा: जहाँ नारी सुरक्षित, वहाँ संसार हर्षित”

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सम्पादक :

युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’

आध्यात्मिक विचारक व साहित्यकार

 (भारतीय संस्कृति, मानवीय मूल्यों के संवाहक)

 

  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 

“अस्तित्व की गरिमा: जहाँ नारी सुरक्षित, वहाँ संसार हर्षित”

: युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’।

 

 

          नारी कल्याण से मानवता के सूर्योदय तक : वर्तमान समाज में जहां कुछ लोग मानवीय मूल्यों से विमुख होकर नारी गरिमा का अनादर करते हैं और उन्हें अनुचित दृष्टि से देखते हैं, ऐसे विचारों का त्याग आवश्यक है। हमारी पूजनीय नारियों को ऐसे नकारात्मक सोच वाले व्यक्तियों से सतर्क और सुरक्षित रहना चाहिए। नारी शक्ति का साक्षात् स्वरूप है और उसके अनेक रूप वंदनीय हैं; जो भी स्त्री का अपमान करता है, वह इस सृष्टि, सृष्टि का सबसे बड़ा अपराधी और घोर पापी है। जहाँ नारी का निरादर होता है, वहाँ सभ्यता का अंत निश्चित है। स्त्री का अपमान केवल एक व्यक्ति का नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता का पतन है।

        “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः”— अर्थात् जहाँ नारी की पूजा होती है, वहीं देवताओं का वास होता है। इसके विपरीत आचरण करने वाला मनुष्य महापापी की श्रेणी में आता है।

 

आज के युग में इंसानियत के मुखौटे के पीछे छिपी हैवानियत समाज के लिए एक गंभीर चुनौती बन गई है। कुछ लोग मानवीय मूल्यों को ताक पर रख चुके हैं। उनके भीतर की संवेदनहीनता ने समाज में एक असुरक्षित माहौल पैदा किया है जो हमारी बेटियों व नारी शक्ति की गरिमा के लिए खतरा है। ऐसी मानसिकता वाले लोगों के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। समय आ गया है कि इन कृत्यों के लिए न्याय सुनिश्चित किया जाए ताकि भविष्य में कोई भी ऐसा करने का दुस्साहस न कर लें। अब केवल आक्रोश व्यक्त करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें सामूहिक रूप से एक ऐसे ‘करुणामय और सुरक्षित’ समाज के निर्माण के लिए आत्म-मंथन करना होगा, जहाँ नारी की गरिमा सर्वोपरि हो। हमें एक ऐसी सुदृढ़ व्यवस्था और परिवेश विकसित करना है जहाँ किसी बेटी की आँखों में डर नहीं, बल्कि उसके हृदय में पूर्ण सुरक्षा तथा सम्मान का विश्वास हो।

 

_निष्कर्ष:_

नारी गरिमा की रक्षा करना हम सभी का परम् कर्तव्य है। एक करुणामयी और मानवीय समाज के निर्माण के लिए ऐसी संरचना आवश्यक है, जहाँ नारी का सम्मान सर्वोपरि हो। जब हम स्त्री की गरिमा को सुरक्षित रखेंगे, तभी लोक-कल्याण का रास्ता प्रशस्त होगा और एक आदर्श समाज की परिकल्पना साकार हो सकेगी।

 

 

॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥

॥ सबका हो कल्याण ॥

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