राजकुमार कुम्भज, जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
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शपथ है हिंदी में हिंदी की।
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शपथ है हिंदी में, हिंदी की
जो कुछ कहूँगा, सच्चे अंदाज में कहूँगा
मदिरापान करते हुए मेला लगाऊँगा
निषिद्धताओं पर भूरे-भूरे प्रवचन दूॅंगा
मनगढ़ंत कथाऍं गढूँगा,चाहे जितनी
झूठ और फरेब और कपट से छलछलाती
अजूबा हो जाऊँगा बेमतलब ही
चीजों के बदलूँगा नाम क्रमशः और पुनः
उत्तरोत्तर अफ़लातून कहलाऊँगा
कहूँगा बच्चों से बार-बार कहूँगा यही-यही
अपनी जुबान, अपनी भाषा, अपने रौब में
बचाते हुए नजरें, मातृभाषा में कहूॅंगा
सीखें बार-बार सीखें शपथ ले लें
अच्छी है हिंदी, सरल है, सच्ची है हिंदी
कमी है यही कि किसी काम की नहीं है
दो दुनिया में, दो रोटी, दो दाम की नहीं है
घर के घर में भी बदनाम ही रही है
बस पीटते रहो ढ़ोल, खोजते रहो पोल
और बोलते रहो मनमर्ज़ी के लंपट बोल
हिंदी इज़ ए वैरी फन्नी लेंग्वेज
रद्दी भी अंग्रेज़ी की बिकती है महँगी
दोहराऊँगा, कमोबेश यही सब दोहराऊँगा
पादुकाएँ उठाई हैं,पादुकाएँ उठाऊँगा
यहाँ-वहाँ बनाऊँगा खास वातावरण स्वैग
सर्कस हो जाऊँगा, जोकर कहलाऊॅंगा
शपथ है हिंदी में, हिंदी की।
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