संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर, (मध्य प्रदेश)
(नया अध्याय, देहरादून)
रिश्तों का खजाना…!
आपस में ‘रिश्ते’ एक स्नेह की जंजीर है,
यह मानो एक डोर है यह एक अंजीर है।
न तुम साथ रहकर यूं इनको निभा पाए,
ना तुम अलग रहकर सबको जोड़ पाए।
गुजर रही है जिंदगी कब करोगे कोशिश!
क्या? कभी नहीं ‘नमाओगे’ अपना शीश।
यूं स्वयं संभलने को तो अभी-भी शेष है,
यह जान लो अभी सभी कुछ ‘विशेष’ है।
सर झुकाकर हाथ ही तो आगे बढ़ाना है,
सामने ही रिश्तों का अनमोल खजाना है।







