राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर।
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
_____________________
असमान गुजर गया जीवन।
_____________________
बीत गया बहुत कुछ बीत गया
मौसम भी बदलते गए तमाम धीरे-धीरे
शेष मुखौटे भी बचे नहीं शेष फिर कहीं
सच कहते शेष रह गईं ज़ुबानें सबकी शेष
झूठ सुनते-सुनते पत्थर हो गये कान तक
ऊॅंचाइयों पर टॅंगा रह गया आसमान
असमान गुजर गया जीवन।
_____________________
समय हुआ मैं सो गया।
_____________________
सोचा था कभी ये भी था सोचा
कि जीवन में जीवन की निरंतरता होगी
और उस निरंतरता में थोड़ी कविता होगी
कविता में फिर कविता जैसा जीवन होगा
और जीवन में जीवन जैसी कविता होगी
जो था सब कुछ उलट-पलट हो गया
समय हुआ मैं सो गया।
_____________________







