डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
दोहे (मकरसंक्रांति)
मकर राशि में सूर्य का, होता यदा प्रवेश।
सूर्य-तेज बढ़ने लगे, उत्तर-दिश जो देश।।
खिचड़ी का यह पर्व तो, होता बहुत महान।
गंगा में डुबकी लगा, करते सब हैं दान।।
पोंगल का शुभ पर्व भी, है खिचड़ी का अंग।
इसे मनाते लोग भी, ले उत्साह – उमंग।।
पर्व मकरसंक्रांति पर, करके शुद्ध नहान।
गंगासागर – ऊर्मि में, करें अमिय-रस-पान।।
करे बंद संक्रांति ही, अशुभ ग्रहों के द्वार।
कर्म मांगलिक को करे, मुदित सकल संसार।।
दान-पुण्य के पर्व पर, होता हिय में हर्ष।
शुद्ध सोच,शुचि भाव से, करे राष्ट्र उत्कर्ष।।
भारत के त्यौहार सब, देते हैं उल्लास।
जागरूक करते उन्हें, जो मन रहें उदास।।







