संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर, (मध्य प्रदेश)
(नया अध्याय, देहरादून)
बीमारियाँ और आबादियाँ…!
ना मैं हार रहा और न बीमारियाँ,
ये ज़िन्दगी की हैं कारगुज़ारियाँ।
आएं चाहे जितनी भी दुशवारियां,
मैं हूँ कमज़ोर करूँगा मज़दूरियाँ।
अपनों की उठानी हैं जिम्मेदारियां,
फ़िर चाहे “बिक” जाए सभी कुछ,
मैंने कमाया हैं अब तक जो कुछ।
चाहे तो हो ही जाए ये बरबादियाँ,
मैं अब ये भी सोचता हूँ कैसे होगा,
कब हो पाऊँगा खड़ा प्रश्न हैं बड़ा।
समय विकट है “तनहा” मैं हूँ खड़ा,
मुझे उम्मीद है “रब ने सोचा” होगा!
वहीं तो लौटाएगा मेरी आबादियाँ।







