राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(सेवा निवृत केन्द्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
बसंती संवाद (कविता)
उसने कहा –
आँखों में क्या छुपा रखा है?
मैंने कहा-
वो सारी रातें, जिनमें तेरा नाम जपता रहा
और सूरज को जल्दी जागने से मना कर दिया।
उसने हँसकर पूछा –
मुझे कितना चाहते हो?
मैंने चुपके से कहा –
इतना कि
अगर तू न रहे तो
मेरा ‘मैं’ भी अधूरा हूं
जैसे किताब बिना कवर की।
वो आँखें झुकाकर बोली –
फिर भी डर लगता है.
मैंने हाथ थामते हुए कहा-
डरने की इजाजत है,
बस इतना वादा करो
कि डरते-डरते भी मेरा हाथ नहीं छोड़ेंगी।
उसने मुस्कुराकर कहा-
वादा है,
पर तू भी वादा कर
कि हर बार जब मैं बिखरु
तू मुझे पहले से ज़्यादा जोड़कर रखना।
मैंने बस इतना कहा –
हर बार नहीं,
आखिरी बार
बिखरने दूँगा ही नहीं।
उसने मेरी आँखों में देखकर कहा-
बस यही काफ़ी है।
और फिर
हम दोनों चुप हो गए
क्योंकि
कभी-कभी सच्चे प्रेम का
सबसे खूबसूरत संवाद
खामोशी में होता है।







