राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
स्मृति-शेष गांधी…..
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गांधी पर जब चाहें तब और जितना चाहें उतना लिखा जा सकता है,किन्तु गांधी के संपूर्ण जीवन-संगीत को सुनना-सुनाना इसलिए आधा-अधूरा रह जाता है क्योंकि गांधी के आंतरिक अंतर्द्वंद्व से सिर्फ़ गांधी ही संघर्षरत रहे.
गांधी की मृत्यु -तिथि 30 जनवरी का दिन “विश्व अहिंसा दिवस “हो गया है, जबकि हथियारों के सबसे बड़े उत्पादक तथा विक्रेता महामानव विश्व शांति का नोबेल सम्मान लगभग लूट लेने, छीन -झपट लेने की धमकीभरी उठा-पटक तक के वचनामृत जगतभर में परोसने पर उतर आए हैं.
ओम् बुद्धाय नमः
ओम् श्रद्धाय नमः
ओम् शांति नमः
गांधी स्मृति को समर्पित श्रद्धांजलि और शत-शत हार्दिक नमन।
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वसंत नहीं सच दूसरा.
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सच है आग-पानी-हवा
पृथ्वी और आकाश की ही तरह
सच है जीवन-मृत्यु भी सच-सच
इनका होना ही है सबूत मेरा होना
मेरे होने का सबूत सिर्फ़ हूँ मैं ही
नहीं कुछ और, नहीं कहीं कुछ और
दूसरा-तीसरा भी होता नहीं कोई
सिर्फ़ एक अकेला विकल्पहीन
वसंत भी होता है एक अकेला ही
वसंत नहीं सच दूसरा.
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एकांत की पुकार है वसंत
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जहाँ-जहाँ लिखना चाहता हूँ प्रेम
वहाँ-वहाँ लिखता चला जाता हूँ वसंत
पहले वसंत लिखता है मुझे, फिर मैं
वह जगाता है मुझे, जागता हूँ मैं
सुलगने से पहले की आहट हैं कुछेक
और हैं कुछेक वे मद्धम ध्वनियाँ भी
जिनमें इसी पृथ्वी, इसी पृष्ठभूमि के सुख-दु;ख भी शामिल तमाम-तमाम
कई-कई बंदिशों के बाद भी आवरणहीन
अनेकांत के एकांत की पुकार है वसंत
जैसे रोशनियाँ अनेकानेक.
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कितने दिन कितने वसंत और?
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मुक्त है और मुक्त करता है सब
घटता है ठीक-ठीक घटनाओं की तरह
घटाता नहीं है कहीं कुछ भी जरा नहीं
पता भी किसी से कुछ पूछता नहीं
देता है मार्ग और दर्शन सभी-सभी को
मगर करे तो करे ही क्या उन लोगों का
जिनके शैतानी दिमाग़ों में शैतानियाँ ढ़ेरों
और घर शरीफ़ों के ख़ाली नहीं
शराफ़त की लगातार रेंग रही चींटियों से
सब देखते हैं और देखता हूँ मैं भी
बहुत कुछ,बहुत कुछ पूछते हुए यहीं कहीं
कितनी तारीख़ें, कितने दिन वसंत और
जब अपने हों, सपने हों सच सब?
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