नवसंवत्सर (दोहे)

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डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या (उ0प्र0)

 

           नवसंवत्सर (दोहे)

स्वागत है नववर्ष का, खुले हर्ष के द्वार।

नवल चेतना से मिले,दिव्य ज्ञान – भंडार।।

 

बने यही नववर्ष ही, जग में प्रगति-प्रतीक।

प्राणाघातक रोग की, औषधि मिले सटीक।।

 

कला-ज्ञान-साहित्य का, होगा सतत विकास।

विमल-शुद्ध नभ-वायु का, बने जगत आवास।।

 

सुख-सुविधा-सम्पन्न कृषि, हों संतुष्ट किसान।

भारत अपना देश ही, होगा श्रेष्ठ – महान ।।

 

सरित-प्रपात-तड़ाग सब, देंगे निर्मल नीर।

निर्मल पर्यावरण से, जाती जन की पीर।।

 

देगा यह नववर्ष भी, जन-जन को संदेश।

मानवता ही धर्म है, जानें रंक-नरेश ।।

 

लोकतंत्र के मूल्य को, समझेंगे सब लोग।

घृणा-भाव को त्याग कर, लेंगे सुर-सुख-भोग।।

 

 

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