अनुराग

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आर.सूर्य कुमारी।

 

                          कहानी

 

                                अनुराग

नैना आठ साल की थी। माता – पिता की चहेती थी। एक मिनट के लिए भी नैना को छोड़ना उनके लिए मुश्किल बन जाता था। नैना जो चाहती थी वही उसको मिल जाता था। क्या खिलौने क्या मिठाई, क्या कापी क्या किताब — कुछ भी उसके लिए दुर्लभ न था। लेकिन एक दिन जब उसे पता चला कि उसके खेलने के लिए उसके माता-पिता एक नन्हा मेहमान लाने वाले हैं, तो उसका मन खुशी से खिल उठा, बिल्कुल कमल की भांति। वह इस बारे में रोज – रोज अपनी मां से पूछने लगी थी। एक आठ साल की बच्ची के सामने मानों जीने का सबसे बड़ा आधार उसके घर आने वाला उसका भाई या बहन ही था। उसने एक – एक कर ढेर सारे खिलौने व गुड़ियां खरीद लिए थे । बस अब वह अपनी कल्पना को साकार होते देखना चाहती थी।

 

लेकिन विधि को कुछ और ही मंजूर था। बहुत ही कठिन स्थिति सामने आ गई। एक सुंदर सलोना नन्हा मुन्ना घर तो आया लेकिन वह नेत्रहीन था। कुछ देख नहीं पाता था । दुख भरे दिन आगे बढ़ने लगे। तमाम चिकित्सकों को दिखलाया गया, मगर सबने यही कहा कि बच्चा नेत्रहीन है। अभी कुछ भी ज्यादा बताना मुश्किल है।

माता – पिता ने तो जैसे तैसे परिस्थितियों से समझौता कर लिया था, मगर नैना अपने को मना न पाती थी कि उसका भाई कभी देख न पाएगा । कारण यह था कि वह नितांत भावुक प्रकृति की थी। कोमल मन की थी, बहुत ज्यादा सकारात्मक सोचने वाली थी। माता – पिता ने जब बच्चे का नामकरण किया तो उसका नाम त्रिनेत्री पड़ा। नैना चाहती थी कि त्रिनेत्री का जीवन सुधर जाए और वह नेत्रहीन होकर भी एक अच्छी जिंदगी का मालिक बन जाए।

 

एक दिन घुटने घुटने चलता त्रिनेत्री दरवाजे तक पहुंच गया और सीढियों से गिर गया, उसे सबने मिलकर उठाया और घर के अंदर ले आए। माता – पिता को बहुत दुख हुआ। आखिर कोई कब तक किसी को पकड़ कर रखेगा। फिर भी माता – पिता उसे अक्सर पलंग से बांध देते थे जिससे कि वह यहां – वहां न हो जाए।

स्कूल से लौटकर नैना को पता चला कि त्रिनेत्री आज गिर गया। नैना को सुनकर बहुत दुख हुआ। उसने त्रिनेत्री को गोद में उठा लिया और उसके साथ खेलने लगी। वह पढ़ती थी तो भी त्रिनेत्री को पास में बैठाकर। पाठ पढ़ती थी तो भी आवाज निकाल कर। इससे त्रिनेत्री बचपन से ही पाठ – कविता सब कुछ मुंह जुबानी सीखने लगा था।

माता – पिता ने त्रिनेत्री को अब नेत्रहीनों की पाठशाला में डालना सही समझ लिया ताकि उसके जीवन का बोझ कम हो जाए । इससे नैना भी सहमत हो गई । जिस दिन त्रिनेत्री को पाठशाला भेजा गया उस दिन नैना को ऐसा लगा कि मानों किसी ने उसके दिल को कुरेद दिया हो, उसे खींचकर लहुलुहान कर दिया हो। तकिए में सर छुपाकर इतनी रोई कि जीवन भर का रोना भी कम पड़ जाए । लेकिन जिंदगी तो उसे जीनी ही थी। माता – पिता को भी कम कष्ट नहीं हुआ, बस वे नैना के आर्तनाद को बढ़ाना नहीं चाहते थे, इसलिए सीने पर पत्थर रख लिया।

देखते – देखते समय बीतता गया और नैना ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। स्कूल की शिक्षिका भी बन गई। मगर उसकी आंखों व दिल में त्रिनेत्री की छवि ही विद्यमान थी और और वह उसके जीवन का सर्वश्रेष्ठ पात्र था।

और इधर त्रिनेत्री ने भी अपनी प्राथमिक पढ़ाई पूरी कर ली और ईश्वरीय योग था कि वह सुंदर – सुंदर कविताएं करने लगा, गीत रचने लगा। मोबाइल पर वह माता – पिता व बहन नैना को अक्सर सुनाया करता था। और उसने यह इच्छा भी जताई दी उच्च माध्यमिक शिक्षा के बाद घर लौटना चाहेगा। गीत लिखने का काम करेगा।

अब सबके जीवन का ठहराव – सा जो बन गया था, उसमें थोड़ी सी गति आ गई थी। त्रिनेत्री घर आ गया था। अब वह काफी सुलझा हुआ था, मगर किसी पर निर्भर रहने की विवशता भी कम नहीं थी। यही वह समय था जब नैना ने अपनी आंखें त्रिनेत्री के नाम कर दी। और तो और अपने सारे अंग भी जरूरतमंदों के नाम कर दिया।

और यह विधान भी था कि नैना का विवाह हो जाए। मन नहीं मानता था, मगर माता – पिता की इच्छा के आगे कुछ न कर पाई। त्रिनेत्री से विदा होते – होते उसमें न जाने कहां से जबर्दस्त ताकत आ गई थी। कई – कई लोगों ने पकड़कर उसे विदा किया। त्रिनेत्री के जीवन का भी यह सबसे दर्द भरा समय था।

ससुराल जो मात्र किलोमीटर की दूरी पर था, वहां नैना के साथ अनहोनी हो गई। डॉक्टरों ने साइलेंट हार्ट अटैक बतलाया। नैना अब इस दुनिया में नहीं थी।

एक ओर नैना की आंखों को त्रिनेत्री में लगाया जाना और दूसरी ओर नैना को अग्नि के सुपुर्द किया जाना, घर – परिवार, स्नेहियों व मित्रों के लिए बहुत व्यस्ततम समय था, व्यस्ततम दौर था।

जब डॉक्टरों ने कहा कि त्रिनेत्री अब देख सकता है, साथ – साथ बातचीत भी कर सकता है । मगर सबसे पहले माता – पिता को ही सामने जाना चाहिए।

लेकिन त्रिनेत्री का आर्तनाद कम नहीं था। उसने महसूस किया कि यह कैसी दुनिया है। कितनी अद्भुत व रंग – रंगीली दुनिया है। उसने इसकी कल्पना सपने में कभी नहीं की थी। यह उसका दुर्भाग्य है कि वह अपनी बहन नैना को नहीं देख पाया। जिसने उसे इतना कुछ दे दिया, वही छू – मंतर हो गई। लगातार ध्यान रखने वाली, अंतरात्मा से प्रेम रखने वाली, एक बड़ी बहन का प्रेम व समर्पण, स्नेह व आत्मिक संबंध हमेशा – हमेशा के लिए मानवता के इतिहास की कहानी बन गया। (विभूति फीचर्स)

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