राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इंदौर।
कवि हूँ, दर्पण हूँ
कवि हूँ, दर्पण हूँ
जो देखता हूँ, वही दिखाता हूँ
मेरा नहीं कुछ भी यहाँ कुछ भी नहीं
जो लिया सबका सब दिया सबका सब
फिर भी कुछ है अपना-सा अपना ही
जो लौटाता हूँ
बारिश हो रही हो तो छाता कैसे तान दूँ?
अंधेरे को धूप होने का फ़रमान कैसे मान लूँ ?
ये जो अंधेरा है, तो अंधेरा ही दिखाऊँगा
लालटेन जो होगी तो कहीं से भी उठा लाऊँगा?
पाँव नहीं, गाँव नहीं, छाँव नहीं है कहीं भी तो क्या हुआ
उजाले के लिए अपना घर क्यों जलाऊँगा?
क्यों नहीं फिर पड़ोसी का चूल्हा ही चुरा लाऊँगा?
आख़िर क्या करूँ, क्या करूँ मैं
कि न जले घर पड़ोसी का ही, न जले घर मेरा भी
और रोशन हो जाए संसार सारा?
सुई सिले दुःख सब के सब
सिर्फ़ इसका, उसका या मेरा, तेरा भूलकर
मिले सभी को मिले पता सभी का
घृणा की जगह विनम्रता रखूँ मैं हर जगह
और हर हत्या के विरुद्ध रखूँ फूल
करूँ विरोध हर कहीं करूँ उन्मुक्त-उन्माद का
ताकि हर कहीं पुकारती पुकार में न हो दरार कोई
और करता रहूँ कोशिश यही मैं हर कहीं, हर कहीं
कवि हूँ, दर्पण हूँ.