आखिरी विकल्प नहीं है आत्महत्या

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गरिमा भाटी “गौरी”।

 

 

आखिरी विकल्प नहीं है आत्महत्या

 

आज के अत्याधुनिक डिजिटल युग में, जहाँ हम तकनीक के माध्यम से दुनिया भर के लोगों से जुड़े हुए हैं, वहीं यह कटु सत्य है कि भावनात्मक रूप से हम दिन-ब-दिन और अधिक अकेले होते जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भले ही किसी के सैकड़ों-हज़ारों ‘फ्रेंड्स’ और ‘फॉलोअर्स’ हों, लेकिन जब व्यक्ति किसी भावनात्मक, आर्थिक या व्यक्तिगत समस्या से जूझ रहा होता है, तो अक्सर उसके पास कोई ऐसा नहीं होता जो बिना जज किए उसे सुने, समझे और साथ खड़ा हो सके। यह एक चिंताजनक विडंबना है कि तकनीकी विकास के साथ-साथ हमारी भावनात्मक जुड़ाव की शक्ति कमजोर होती जा रही है। समाज में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी मानसिक तनाव, दबाव या संघर्ष से गुजर रहा है, परन्तु उसकी भावनाओं को साझा करने के लिए कोई ऐसा ‘अपना’ नहीं होता जिससे वह निःसंकोच बात कर सके। हाल ही में एक अत्यंत दुखद और झकझोर देने वाली घटना में आठवीं कक्षा की एक छात्रा ने केवल एक विषय में असफल होने के कारण आत्महत्या कर ली। यह घटना मात्र एक खबर नहीं, बल्कि एक सवाल है—हमारी व्यवस्था, हमारी सोच, और हमारे सामाजिक दायित्व पर। क्या वह बच्ची इतनी कमजोर थी कि एक असफलता उसे तोड़ गई, या हम एक अभिभावक, शिक्षक, समाज और इंसान के रूप में अपनी भूमिका निभाने में असफल रहे? हर बार जब किसी आत्महत्या की खबर आती है, तब समाज में लोग यही कहते हैं — “काश उसने अपनी परेशानी बताई होती”, “काश हम समय रहते उसकी मदद कर पाते”, “काश हम उससे एक बार बात कर लेते।” लेकिन ये सभी ‘काश’ तब सामने आते हैं जब बहुत देर हो चुकी होती है।

वास्तविकता यह है कि जब कोई व्यक्ति जीवन के संघर्षों से जूझ रहा होता है, तो वह अक्सर अकेला होता है। वह जब मदद की उम्मीद करता है, तो आसपास के लोग उससे दूरी बना लेते हैं। कई बार वह व्यक्ति अपने करीबी लोगों से मदद की उम्मीद करता है, परंतु उन्हें नज़रअंदाज़ किया जाता है, उनके कॉल तक नहीं उठाए जाते और बात करने की बजाय मज़ाक बनाया जाता है। आज का समाज एक ऐसी असंवेदनशीलता की गिरफ्त में है जो आत्महत्या जैसी त्रासद घटनाओं का एक बड़ा कारण बन रही है। जब किसी व्यक्ति की नौकरी चली जाती है, व्यापार में घाटा हो जाता है, या निजी संबंध टूट जाते हैं, तब हम पीछे से तो बातें करते हैं लेकिन सामने से उसकी हालत जानने की कोई कोशिश नहीं करते।

यह समझना बेहद जरूरी है कि आत्महत्या कोई क्षणिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह एक लंबी मानसिक पीड़ा और निरंतर उपेक्षा का परिणाम होती है। व्यक्ति जब लगातार सहायता की पुकार करता है और कोई उसकी भावनाओं को नहीं सुनता, तब वह धीरे-धीरे अंदर से टूट जाता है। जब उसे यह विश्वास हो जाता है कि लोगों से भारी इस दुनिया में वह नितांत अकेला है, तब वह इस कदम की ओर बढ़ता है। और तब समाज केवल पछतावा करता है, लेकिन शायद एक संवेदनशील संवाद, एक स्नेहिल आलिंगन या एक सरल वाक्य “मैं तुम्हारे साथ हूँ” जैसी बात उस व्यक्ति की जान बचा सकती थी।

आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे सामाजिक ताने-बाने की विफलता है। यह उस माहौल की असफलता है जहाँ कोई व्यक्ति इतना अकेला महसूस करता है कि वह जीने की इच्छा खो देता है। जब कोई व्यक्ति बार-बार संकेत देता है कि वह परेशान है, टूट चुका है, थक गया है — और फिर भी कोई उसकी बात नहीं सुनता, तब आत्महत्या एक सामाजिक चेतावनी बन जाती है। और इस चेतावनी को हमें नजर अंदाज नहीं करना चाहिए।

समाज के लिए यह आवश्यक हो गया है कि हम ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ लोग खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकें। जहाँ बच्चों को यह सिखाया जाए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत का अवसर है। जहाँ युवाओं को यह भरोसा हो कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, वे अकेले नहीं हैं। हमें अपने व्यवहार में संवेदनशीलता, सहानुभूति और समझदारी लाने की आवश्यकता है। आत्महत्या को “आख़िरी विकल्प” मानने की सोच को बदलना होगा और इसे एक सामाजिक असफलता की तरह देखना होगा।

हर आत्महत्या हमें यह संदेश देती है कि कहीं न कहीं हम एक बेहतर इंसान बनने में चूक रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी समस्या हमारे साथ साझा करता है, तो हमें उसका मज़ाक नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उसकी मदद करनी चाहिए। आत्महत्या को रोकने के लिए हमें वह “पहला कदम” बनना होगा जो किसी को नई उम्मीद दे सके, नया जीवन दे सके।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर टूटता हुआ इंसान बस यही चाहता है कि कोई उसकी भावनाओं को समझे, कोई उसे अपनाए और कहे — “मैं तुम्हारे साथ हूँ।” यदि हम यह करने में सफल हो जाएं, तो आत्महत्या कभी किसी का चुनाव नहीं बनेगी, बल्कि एक असंभव विकल्प बन जाएगी। अंततः, आत्महत्या न तो कोई विकल्प है और न ही समाधान, यह एक चीख है — जिसे हमें सुनना है, समझना है, और उसके उत्तर में एक हाथ आगे बढ़ाना है। यही एकमात्र उपाय है कि हम एक ऐसा समाज बना सकें जहाँ कोई भी व्यक्ति इस अंतिम कदम को उठाने के लिए मजबूर न हो।(विनायक फीचर्स)

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