गाँव-नगरों में ध्वज केवल पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों के हाथों में लहराए।

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✍️ डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

 बड़वा (सिवानी) भिवानी, हरियाणा 

         

               सैनिक ही असली ध्वजवाहक

 

गाँव-नगरों में ध्वज केवल पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों के हाथों में लहराए।

 

तिरंगा केवल राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आत्मा और बलिदानों की गाथा है। इसकी असली गरिमा तभी बनी रहेगी जब इसे वही हाथ फहराएँ जो इसके लिए प्राणों की आहुति देने को तत्पर रहते हैं। इसलिए गाँव-नगरों में झंडा फहराने का अधिकार शहीद सैनिकों की विरांगनाओं, पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों को मिलना चाहिए। यह परंपरा केवल सम्मान ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा भी बनेगी। राष्ट्र को बलिदान और सेवा की पहचान यही सिखाती है कि सैनिक ही असली ध्वजवाहक हैं।

स्वतंत्रता दिवस केवल एक तिथि या राष्ट्रीय पर्व नहीं है, बल्कि यह उन लाखों बलिदानों की याद दिलाने वाला दिन है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें स्वतंत्रता दिलाई। 15 अगस्त केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आत्ममंथन का क्षण है। हर बार जब तिरंगा लहराता है तो हमें यह सोचना चाहिए कि इस पवित्र ध्वज का सबसे बड़ा अधिकार आखिर किसके हाथों में होना चाहिए।

 

आज यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है क्योंकि स्वतंत्रता के 79 वर्षों बाद भी हम इस सवाल का स्पष्ट और न्यायपूर्ण उत्तर खोजने में असफल रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर मंचों पर अधिकतर नेता, अधिकारी या सरकारी प्रतिनिधि ध्वज फहराते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन क्या यह सही है? क्या तिरंगे को फहराने का सबसे बड़ा सम्मान उन हाथों तक नहीं पहुँचना चाहिए जिनकी वजह से यह ध्वज आज स्वतंत्र आकाश में लहरा रहा है?

 

ध्वज का अधिकार—सिर्फ सैनिकों का

 

अब समय आ गया है कि पूरे देश में एक नई परंपरा स्थापित हो। राष्ट्रीय पर्वों पर—

 

सबसे पहले शहीद सैनिकों की विरांगनाओं को झंडा फहराने का अवसर मिले।

 

उसके बाद पूर्व सैनिकों को।

 

और फिर वर्तमान सैनिकों को।

 

राज्य और ज़िला स्तर पर सरकार के प्रतिनिधि झंडा फहराएँ, यह स्वीकार्य है, लेकिन गाँव और नगर स्तर पर यह अधिकार केवल सैनिकों और उनके परिवारों के हाथों में होना चाहिए।

 

यह व्यवस्था इसलिए भी उचित है क्योंकि इस दुनिया में कोई किसी और के लिए प्राण नहीं देता। केवल सैनिक ही वह वीर हैं जो पूरे राष्ट्र के लिए अपनी जान न्यौछावर कर देते हैं। बाकी लोग अक्सर ऐसे अवसरों को अपने प्रचार और तस्वीरें खिंचवाने तक सीमित कर देते हैं।

 

बलिदान की गरिमा

 

आज़ादी की असली क़ीमत वही जान सकता है जिसने सीमा पर खड़े होकर गोलियों की आवाज़ सुनी हो, जिसने युद्ध की भयावहता देखी हो, या जिसने अपने बेटे, पति, भाई या पिता को मातृभूमि के लिए खोया हो। बलिदान की यह गरिमा न तो राजनीतिक मंचों पर भाषणों से आती है, न ही मंच पर चमकते कैमरों से। यह गरिमा केवल सैनिक और उसका परिवार समझ सकता है।

भारत के इतिहास में हर मोड़ पर यही सत्य दिखाई देता है। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हो, 1962, 1965 और 1971 के युद्ध हों, या फिर 1999 का कारगिल युद्ध—हर बार सैनिकों ने अपने खून से तिरंगे की लाज रखी है। आज़ादी के बाद भी आतंकवाद-निरोधी अभियानों से लेकर सीमा पर लगातार होने वाली झड़पों तक, सैनिकों ने राष्ट्र की सुरक्षा के लिए जो बलिदान दिया है, वह किसी शब्द में समेटा नहीं जा सकता।

 

ध्वज का प्रतीक और सैनिक की शपथ

तिरंगा केवल तीन रंगों का कपड़ा नहीं है। यह करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और आत्मसम्मान का प्रतीक है। इसमें शांति, साहस और प्रगति का संदेश है। लेकिन इस ध्वज को सदैव स्वतंत्र रखने का संकल्प सबसे पहले सैनिकों ने लिया।

जब कोई सैनिक सेना में भर्ती होता है, तो वह केवल नौकरी नहीं करता, वह मातृभूमि की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने की शपथ लेता है। उसके लिए तिरंगा केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प है। इसलिए जब सैनिक या पूर्व सैनिक तिरंगे को फहराता है तो वह केवल एक औपचारिकता नहीं होती, बल्कि एक जीवित प्रतिज्ञा होती है। इसके मुकाबले किसी राजनेता या अधिकारी द्वारा झंडा फहराना अक्सर केवल प्रोटोकॉल और रस्म अदायगी भर रह जाता है।

 

राजनीति बनाम बलिदान

 

दुर्भाग्य यह है कि आज स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम अनेक जगहों पर राजनीतिक प्रदर्शन का माध्यम बन गए हैं। मंचों पर नेताओं की लंबी-लंबी बातें होती हैं, झंडा फहराने के तुरंत बाद कैमरों के सामने तस्वीरें खिंचती हैं और लोग तालियाँ बजाकर घर लौट जाते हैं।

लेकिन यदि यही झंडा किसी पूर्व सैनिक या शहीद की पत्नी के हाथों में सौंप दिया जाए तो वह क्षण केवल रस्म नहीं रहेगा। वह दृश्य श्रद्धा, बलिदान और देशभक्ति का वास्तविक संदेश बनेगा। इससे युवाओं और बच्चों को यह सीख मिलेगी कि असली नायक वे नहीं हैं जो भाषण देते हैं, बल्कि वे हैं जो खामोशी से अपना जीवन राष्ट्र के लिए अर्पित कर देते हैं।

 

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण

 

दुनिया के कई देशों में यह परंपरा है कि राष्ट्रीय पर्वों पर सैनिक या उनके परिवार ध्वज फहराते हैं। इससे सैनिकों की गरिमा और बलिदान को सर्वोच्च स्थान मिलता है। अमेरिका, रूस, इज़राइल और कई यूरोपीय देशों में सैनिकों और वॉर वेटरन्स को राष्ट्रीय दिवसों पर प्राथमिकता दी जाती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में, जहाँ सेना केवल सीमाओं की रक्षा ही नहीं बल्कि आपदा राहत, शांति स्थापना और विकास कार्यों में भी योगदान देती है, वहाँ यह परंपरा और भी आवश्यक है।

 

युवाओं के लिए प्रेरणा

 

आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और आभासी दुनिया में व्यस्त है। उनके लिए देशभक्ति कई बार केवल नारे और फिल्मी गीतों तक सीमित रह जाती है। लेकिन यदि गाँव-नगरों में तिरंगा पूर्व सैनिकों और शहीदों की विरांगनाओं के हाथों में फहराया जाए तो यह दृश्य युवाओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ेगा।

 

वे समझ पाएँगे कि राष्ट्रप्रेम केवल भाषणों और नारों से नहीं आता, बल्कि बलिदान और सेवा से आता है। यह परंपरा उन्हें सेना में जाने, अनुशासन अपनाने और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने की प्रेरणा देगी।

 

नया संकल्प

 

यदि हम चाहते हैं कि स्वतंत्रता दिवस केवल औपचारिक पर्व न रह जाए, तो हमें इसे सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय संकल्प दिवस बनाना होगा। इसके लिए ध्वज को उन्हीं हाथों में देना होगा जो इसके लिए सबसे योग्य हैं। इससे न केवल सैनिकों का सम्मान होगा, बल्कि समाज में यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि राष्ट्रभक्ति का असली अर्थ केवल सैनिक जीवन से सीखा जा सकता है।

 

आज जब हम 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो हमें याद रखना होगा कि तिरंगे का सम्मान केवल तभी सच्चा होगा जब इसे वही हाथ उठाएँ जो इसके लिए प्राणों की आहुति देने का साहस रखते हैं। सरकार और समाज यदि यह परंपरा स्थापित कर दें कि गाँव-नगरों में ध्वज केवल पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों के हाथों में लहराए, तो यह न केवल बलिदान की गरिमा को स्थापित करेगा, बल्कि हर भारतीय के दिल में देशभक्ति का नया संकल्प भी जगा देगा।

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