सम्पादक दिल्लीः अजय प्रताप सिंह।
“अजब गजब विदिशा पुलिस, सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी हवा हवाई”
वैसे तो भारतीय पुलिस का चरित्र लगभग समान ही है, और हो भी कयूँ न, आखिर भ्रष्टाचार रग रग में जो समा गया है। सत्तायें भले ही बदलती हों, आम जन कुछ सुखद अनुभूति भले ही पुलिसिया व्यवहार में परिवर्तन की पाल बैठता हो सत्ता परिवर्तन के साथ, लेकिन अंततः मान बैठता है कि पुलिस में बदलाव की अपेक्षा मुर्खता पालने से अधिक कुछ नहीं!
बीजेपी शासित राज्यों में कानून व्यवस्था मापने की अपनी पहली कोशिश हमने की मध्य प्रदेश के विदिशा से! लेकिन हम हतप्रभ रह गए, ऐसे ऐसे मामले सामने आये कि भ्रष्टाचार के सिरमौर भी इनके कारनामे देखकर खुद को पिद्दी मानने पर विवश् हो जांय, वहीं लगने लगा कि कहीं न कहीं डीप स्टेट पर्दे के पीछे इतना संगठित हो गया है, कि सत्ताऐं शायद इनके बिना खुद को अप्रसांगिक मानने के लिए विवश होकर रह गयी हैं, या यूँ कहें कि उसने डीप स्टेट के सामने खुद को बौना मान लिया है। या अपरिहार्य मान लेने तक की मौन स्वीकृति देने में ही भलाई समझ ली हो?
कल्पना कीजिये, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की, वह भी पूरी निडरता के साथ, आप सोच रहे होंगे, ऐसा नहीं हो सकता, बिल्कुल हम भी ऐसा ही सोचते थे, लेकिन ऐसा होता है और वह भी बीजेपी शासित मध्यप्रदेश की विदिशा पुलिस द्वारा। हुआ कुछ ऐसा कि, इस कड़ी में साधना दास जी ने 25 जून को एक आवेदन बीएनएस की धारा 111/1 के तहत् विदिशा कोतवाली को दिया, साधना जी ने अपने ही दो भाईयों को अपने मकान से बेदखल करने का आवेदन विदिशा कोतवाली को दिया, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार साधना जी के आवेदन पर नियम अनुसार विदिशा कोतवाली पुलिस को आवेदन की तिथि के एक माह के भीतर कब्जा धारियों को बेदखल करना अनिवार्य होता है, लेकिन तीन महीने बीतने को हैं, आवेदिका को न कब्जा मिला, न जवाब। बकौल साधना जी के एक रोज विदिशा कोतवाली के किसी सब इंस्पेक्टर का फोन यह बताने के लिए आया कि आपके भाईयों ने आपके विरुद्ध शिकायत की है, कोतवाली आना होगा। अब समझा जा सकता है कि शिकायत किसकी शह पर और किसलिये की गई होगी, ताकि डराया जा सके। समझा जा सकता है कि आखिर पुलिस किसलिये दबाव बनाने का प्रयास कर रही होगी। और इससे किसे फायदा हो रहा होगा….?
आपको बता देंं कि नये कानून में अवैध कब्जा धारियों को संपत्ति मालिक के एक आवेदन पुलिस को संपूर्ण मालिकाना दस्तावेज के साथ करने के महीने भर के भीतर पुलिस को यह अधिकार दिया गया है कि वह संपत्ति मालिक को कब्जा दिलाने के लिए बाध्य कर दी गई है। पुलिस को यह अधिकार संवर्धित कानून में स्पष्ट रूप से तो दिया ही गया है, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे अपने अभी तक के दिये गये, सात निर्णयों में भी उल्लेखित करते हुए साफ कहा गया है, साधना जी ने सुप्रीम कोर्ट के वे सभी निर्णय अपने आवेदन के साथ संलग्न भी किये, ताकि संशय न रहे।
इस संदर्भ में स्वंय इस संपादक ने जब विदिशा कोतवाली के प्रभारी श्री आनंद राज से बात की ! हैरत की बात है कि कोतवाल आनंद राज जी ने बताया कि यह मामला उनके संज्ञान में है लेकिन पुलिस को संपत्ति मामले में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार दिया ही नहीं गया है। आगे कोतवाल साहब फर्माते हैं कि साधना को मकान खाली कराने के लिए पहले एसडीएम कोर्ट का आदेश लाना होगा, तभी पुलिस उनकी मदद कर पायेगी। हैरत की बात तो यह है कि कोतवाल साहब को इतनी जानकारी भी नहीं, कि इस कानून को लाने के पीछे का मुख्य कारण ही बिना किसी पचड़े, समय और धन की बर्बादी रोकने के लिए पुलिस को अधिकृत किया गया है। यही इस कानून की विशेषता है। अब सीधे तौर पर यह न मानने का कोई कारण नजर नहीं आता कि, पुलिस इस कानून के मर्म और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना में जरा भी हिचक क्यूँ नहीं रही..? इस विषय में जानकारों का मानना है कि पुलिस लोगों की मनोदशा भांपती है पुलिस मानती है कि कोई सामान्य आवेदक सुप्रीम कोर्ट जाने से रहा, इससे अवमानना की तलवार भी चलने से रही।
जनपद विदिशा पुलिस के दो कारनामे आप पढेंगे तो शायद निश्चित विश्वास न कर पांये, लेकिन है कटू सत्य! दोनों ही कारनामे के पीछे गहरी साजिश की बू साफ दिख पडती है। यह क्रूर घटना हैरतअंगेज है। दर असल दोनों ही कारनामे पुलिस की शर्मनाक मिली भगत को साफ दर्शाते हैं, जिसके पुख्ता सबूत हमारे पास हैं। घटना का केंद्रीय पात्र एक शादीशुदा लफंगा जो विदिशा में किराये पर रहता है,यही लफंगा गंजबासौदा पुलिस को एक आवेदन देता है, जिसमें एक सम्पन्न घराने की सम्मानित शादीशुदा महिला को अपनी पत्नी बताते हुए शिकायत करता है कि अमुक महिला उसकी पत्नी है लेकिन उसके साथ नहीं रहती, अतः मेरी पत्नी को पुलिस मेरे साथ रखवाये….!! अब गंज बासौदा पुलिस महिला को सम्मन करती है, फोन पर धमकाती है, महिला चीख चीख कर उस लफंगे की करतूत का काला चिट्ठा पुलिस के सामने खोलती है, बताती है कि वह दो बच्चों की माँ भी है और शादीशुदा भी, लेकिन पुलिस तो पुलिस है, आखिरकार मामले को परिवार परामर्श केंद्र विदिशा भेज दिया जाता है। यहाँ फिर महिला का मानमर्दन चटकारे ले लेकर किया जाता रहा, या यूँ कहिये कि महिला को विवश् किया जाता रहा कि वह उस लफंगे की बनकर रहे, जो पुलिस का खास था या है। आखिर में जब महिला टस से मस न हुई तो मनमाने तरीके से रिपोर्ट तैयार की गई कि अब वे कोर्ट में मामला ले जांय। इसकी कापी हमारे पास सुरक्षित है।
दूसरे मामले में यही लफंगा उस महिला और एक तथाकथित स्वंयभू पत्रकार पर फिर गंज बासौदा पुलिस को आवेदन देकर कहता है कि एक पत्रकार और मेरी पत्नी के अवैध संबंध हैं और वे उसकी हत्या कर सकते हैं। वाह री गंजबासौदा पुलिस फिर अपने चहेते लफंगे के पक्ष में उस स्वंयभू पत्रकार को शांति भंग में निरुध कर देती है। वह पत्रकार एसडीएम कोर्ट में छ: महीने तक तारीख भुगतने के सिवाय कुछ न कर पाया।
हैरानी की बात तो यह है कि विदिशा में रहने वाले लफंगे का गंजबासौदा पुलिस से कैसा गठजोड़ है कि विदिशा में रहकर शिकायत गंजबासौदा में होती ही न रहीं, वरन उनपर मनमानी की पराकाष्ठा ही पुलिस ने बेखौफ होकर पार कर दी।
कहना उचित ही होगा कि, जिस जनपद में पुलिस और डीप स्टेट का गठजोड़ इतना मजबूत हो कि कानून पानी भरता नजर आये, तो न्याय की अपेक्षा बेमानी ही कही जा सकती है। तो फिर कानून के नाम की रोटी खाने वाले इतने बेखौफ राजनैतिक संरक्षण के बिना हैं या डीप स्टेट के इशारे पर ही सब कुछ चलता रहेगा। कब पुलिस के आला अधिकारी कानून के मर्म और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अक्षरत: पालन की कसम पर खरे उतरेंगेः, यह यक्ष प्रश्न आ खड़ा हुआ है।
परत दर परत की दूसरी किस्त, तीसरी किस्त में कल आप पढेंगे ” वे मर्द नामर्द कैसे हो गये”। हैरतअंगेज, विभत्स, सच्ची कहानी।







