✍️प्रभारी सम्पादक (म. प्र.): व्यंग्यकार: राजेन्द्र सिंह जादौन
“मोहब्बत अब अखबार बन गई है”
आजकल मोहब्बत भी अखबार की तरह हो गई है।
जब हाथ में न आए, बेचैनी रहती है। सुबह उठते ही दिल बेचैन, मन बेचैन, और आँखें अधूरी सुर्ख़ियों की तलाश में। ठीक वैसे ही जैसे बिना अख़बार के चाय का मज़ा अधूरा लगता है। उत्सुकता बढ़ती जाती है, आकर्षण चरम पर होता है, और दिल सोचता है आज कौन सी कहानी छपेगी?
लेकिन जैसे ही मोहब्बत हाथ में आती है, पहले पन्ने की चमकदार मुख्य खबर की तरह चमकती है। हर कोई देखता है, हर कोई हँसता है, और कुछ लोग अपने टिपण्णी छोड़ जाते हैं। सुबह का रोमांच हिट सुर्ख़ी बन जाता है। लेकिन ज्यादा देर तक यह चमक नहीं टिकती। कुछ समय बाद द्वितीय पन्ना आता है, फिर नगर पृष्ठ की छोटी-छोटी खबरें नजर आने लगती हैं।
और देखते-देखते मोहब्बत का शहर झगड़े, मामूली धोखे और व्यावसायिक शिकायतों से भर जाता है। सुबह की रोमांस की मुख्य खबर शाम तक बासी हो जाती है। मोहब्बत का हिट प्रभाव खत्म, और सबकी निगाहें अगले अंक की ओर।
आजकल मोहब्बत का भी सदस्यता योजना है “साप्ताहिक योजना”, “मासिक योजना”, कभी परीक्षा अवधि, और जो सदस्य संतुष्ट नहीं, उन्हें तुरंत सदस्यता समाप्त कर दिया जाता है। इश्क़ अब सामग्री बन गया है। भावनाएँ संपादकीय नोट्स में बदल गई हैं। हर मुस्कान स्वीकृत होती है, हर आंसू संशोधित, और दिल की हर धड़कन सुर्ख़ियों में गिनती है।
कभी मोहब्बत में खत लिखे जाते थे, अब कथा डाली जाती है। पहले दिल में बसता था इश्क़, अब समय रेखा में। कभी इंतज़ार रोमांस था, अब उत्तर न मिले तो दूर कर दिया जाता है। कभी इश्क़ व्यक्तिगत था, अब मीडिया-प्रबंधित है। हर रिश्ता समाचार बन गया, हर झगड़ा बहस का विषय।
मोहब्बत अब लोकतंत्र की तरह हो गई है सबको बोलने की स्वतंत्रता है, पर सुनने वाला कोई नहीं। रिश्ते अब राजनीतिक अभियान की तरह हैं सफलता वही, जिसकी प्रचार अच्छी, और असफल वही, जिसका विषय कमजोर।
सुबह ताज़ा, शाम बासी, हर दिन नया अंक, हर दिन नई सुर्ख़ी। दिल अब नहीं जलता, केवल प्रसारित होता है इश्क अब सुर्ख़ियों में बनता है, और मोहब्बत केवल मुद्रित होती है।
मोहब्बत अब अख़बार बन गई है। हर कोई पढ़ता है, हर कोई बिकता है, लेकिन कोई समझता नहीं। दिल नहीं टूटते, केवल सुर्ख़ियाँ बदलती हैं।और प्रेम अब सामग्री प्रबंधन की जिम्मेदारी बन गया है।
आजकल मोहब्बत भी
अख़बार की तरह हो गई है
जब तक हाथ में न आए,
बेचैनी रहती है;
और जब मिल जाती है,
तो पढ़ने की जल्दी होती है।
सुबह-सुबह जैसे ही खुलती है,
पहला पन्ना चमकता है
सुर्ख़ियों में नाम,
कुछ बड़ी बातें,
थोड़ी शोहरत, थोड़ी सनसनी।
पहले पेज पर
हर मोहब्बत लीड ख़बर होती है
जिसे हर कोई देखता है,
जिस पर हर कोई राय देता है।
मगर वक्त के साथ
वो पहले पन्ने से खिसकने लगती है
सेकेंड लीड पर,
फिर मेट्रो पेज पर,
जहाँ शहर की भागदौड़ और अपराधों के बीच
वो भीड़ में खो जाती है।
धीरे-धीरे मोहब्बत भी
बासी ख़बर बन जाती है
किसी के चाय के प्याले के नीचे,
किसी बहस के टुकड़ों में,
या किसी और नाम की हेडलाइन में।
कभी वह “ब्रेकिंग न्यूज़” थी,
अब बस “पुरानी बात” है।
कभी वो दिल का फ्रंट पेज थी,
अब एडिटोरियल की आख़िरी कॉलम में
किसी अधूरे वाक्य की तरह रह गई है।
अख़बार की तरह,
मोहब्बत भी रोज़ छपती है
कभी किसी मुस्कान में,
कभी किसी स्क्रीनशॉट में,
कभी किसी चैट की लाइन में।
और फिर…
हर शाम बासी हो जाती है,
रद्दी में चली जाती है।
कभी किसी और की सुर्ख़ियों के बीच,
हमारी मोहब्बत
बस एक पुराना अंक बनकर रह जाती है।
“प्रेम अब खबरों-सा है।
हर सुबह ताज़ा,
हर शाम पुराना।”







