सैनिक सरोकारों के सारथी : मुलायम सिंह यादव।

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हरी राम यादव, अयोध्या (उ. प्र.)

 

 

 

सैनिक सरोकारों के सारथी : मुलायम सिंह यादव।

 

किसी की पीड़ा को वही व्यक्ति महसूस कर सकता जो उस तरह की पीड़ा से गुजरा हो या देख सुनकर अनुभव किया हो। हमारे देश की राजनीति में एक ऐसे नेता हुए जिन्होंने सैनिकों और उनके परिजनों की पीड़ा को देखा, सुना और समझा। मुख्यमंत्री और रक्षामंत्री रहते हुए उन्होंने ऐसे ऐसे ऐतिहासिक निर्णय लिए जो कि अपने आप में एक नजीर है। जब कोई सैनिक देश की सीमा पर लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हो जाता है और उस सैनिक का पार्थिव शरीर जब उसके पैतृक गांव में पहुंचता है तो लोगों के मुंह में उनका नाम बरबस आ जाता है और वह नाम है मुलायम सिंह यादव।

 

90 के दशक में उत्तर प्रदेश की सत्ता से केन्द्रीय सत्ता की ओर मुलायम सिंह यादव मुड़े । 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को 17 सीटें मिली और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी। लेकिन वह सरकार 13 दिन में ही गिर गई। उसके बाद एच डी देवगौड़ा देश के नए प्रधानमंत्री बने। इस सरकार में मुलायम सिंह ने एच डी देवगौड़ा को समर्थन दिया। जब विभागों का बंटवारा हुआ तब मुलायम सिंह यादव को रक्षा मंत्री बनाया गया । मुलायम सिंह यादव देवेगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल की सरकार में 1996 से 1998 के बीच दो साल तक भारत के रक्षा मंत्री रहे।

 

रक्षा मंत्री के अपने कार्यकाल में उन्होंने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया कि देश के जो सैनिक मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त होते हैं उनका पार्थिव शरीर , उनके घर सैनिक सम्मान के साथ पहुँचाया जायेगा और उस जनपद के जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक अंतिम संस्कार में शामिल होंगे। इससे पहले सेना में ऐसा कोई नियम नहीं था। इससे पूर्व जब भी सेना का कोई जवान वीरगति को प्राप्त होता था, तो उसका पार्थिव शरीर उसके घर नहीं पहुंचाया जाता था। वीरगति प्राप्त सैनिक का अंतिम संस्कार, सेना के जवान सैनिक के धर्म के अनुसार युद्ध क्षेत्र में कर देते थे और जवान के घर उसकी वर्दी और सामान भेज दिया जाता था ।

 

छोटा कद, गठीला बदन, शरीर पर धोती, कुर्ता और कुर्ते के ऊपर सदरी पहने और चेहरे पर आत्मविश्वास से लबरेज, साधारण सा लगने वाला एक व्यक्ति, जिसकी बड़ी सोच ने उसे भारतीय सेना के सैनिकों और उनके परिजनों के दिलों का राजा बना दिया, जो सैनिक अपने शौर्य, पराक्रम, वीरता, तथा बलिदान के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं और जो सैनिक “सर्विस बिफोर सेल्फ” की उच्च भावना के लिए पूरे विश्व में जाने जाते हैं।

 

अगर हम संख्यात्मक दृष्टि से देखें तो हमारी भारतीय सेना विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना और फायर पॉवर इंडेक्स के अनुसार विश्व की चौथी शातिशाली सेना है। आजादी के बाद से 1996 तक तीन युद्ध पाकिस्तान के साथ और एक युद्ध चीन से लड़ चुकी है । आजादी से पूर्व हमारे देश की सेना ने प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में भी भाग लिया तथा इन युद्धों में हमारे देश के लगभग 1 लाख 34 हजार जवान वीरगति को प्राप्त हुए और यदि घायल सैनिकों की संख्या की बात की जाए तो वह वीरगति प्राप्त सैनिकों की संख्या से बहुत ज्यादा थी । उस समय देश के जवानों के परिवार काफी पीड़ा में थे। इस पीड़ा को उस समय की अंग्रेज सरकार और अंग्रेजी सेना के अधिकारियों ने समझा। सैनिक परिवारों तक राहत पहुंचाने और सैनिकों का लेखा-जोखा रखने के लिए उन्होंने सन् 1917 में वार बोर्ड की स्थापना की जो कि बाद में राज्य सैनिक बोर्ड के नाम से जाने जाने लगा। इसके बाद सैनिकों तक पहुंच बनाने के लिए जिलों में जिला सैनिक बोर्डों की स्थापना की गयी।

 

मुलायम सिंह यादव ने रक्षा मंत्री रहते हुए कई चौकाने वाले निर्णय लिए । उन्होंने सियाचीन में तैनात सेना के जवानों की समस्याओं को समझने के लिए वहां का दौरा किया और वहां जाकर सैनिकों की समस्याओं को जाना समझा । सियाचीन में जाने वाले वह पहले रक्षा मंत्री थे । रक्षा मंत्री रहते हुए उन्होंने रक्षा प्रतिष्ठानों में हिंदी पत्राचार को बढ़ावा दिया । उनके कार्यकाल के दौरान 5वें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, इस वेतन आयोग में जो कमियां रह गयीं थी उन कमियों को उन्होंने बड़ी सिद्दत के साथ दूर किया । इस वेतन आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद ही सेना के जवानों और जूनियर कमीशन अधिकारियों के जीवन स्तर में सुधार हुआ।

 

उत्तर प्रदेश जनसंख्या की दृष्टि से बड़ा राज्य होने के साथ साथ देश को सबसे ज्यादा सैनिक देने वाला राज्य भी है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में बहुत बड़ी संख्या में प्रदेश के सैनिकों ने भाग लिया और काफी सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए एवं वीरगति प्राप्त करने वाले सैनिकों से ज्यादा संख्या में सैनिक घायल हुए । जब मुलायम सिंह यादव ने 15वें मुख्यमंत्री के रूप में पहली बार 05 दिसम्बर 1989 को शपथ ली, तो उन्होंने 1991 में प्रदेश के द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिए हुए सैनिकों के लिए पेंशन योजना शुरू की, जो कि उस समय 100 रूपए दी जाती थी, उस समय प्रदेश में इस युद्ध के सैनिकों /वीर नारियों की संख्या लगभग 16 हजार थी। इस पेंशन को 21 अक्टूबर 2013 को तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार ने बढ़ाकर 4000/- और 04 फ़रवरी 2016 को बढ़ाकर 6000/- किया। इस समय इस पेंशन को पाने वाले सैनिक /वीर नारी मुश्किल से 1000 ही जीवित होंगे। लगभग 09 साल बीतने के बाद भी द्वितीय विश्व युद्ध की पेंशन में राज्य सरकार द्वारा कोई वृद्धि नहीं की गयी है जबकि मंहगाई लगभग दुगुना बढ़ गई है ।

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो पौधा पूर्व सैनिक कल्याण निगम के रूप में लगाया था, आज वह विशाल वट वृक्ष बन गया है और वर्तमान समय में लगभग 23000 सेवानिवृत्त सैनिकों के परिवारों को अपनी छाया प्रदान कर रहा है। उन्होंने निगम को सुचारू रूप से चलाने के लिए पहले प्रबंध निदेशक की नियुक्ति की और अपने तीसरे कार्यकाल में पूर्व सैनिक कल्याण निगम को स्थाई कार्यालय प्रदान किया। तीसरे कार्यकाल में ही प्रदेश के वीरगति प्राप्त सैनिकों के परिजनों के हित में निर्णय लेते हुए उनको नगरपालिका और नगर निगमों में गृहकर से छूट प्रदान की ।

 

एक रक्षा मंत्री के रूप में उन्होंने सैनिकों के हित में ठोस निर्णय लिए कभी राजनीतिक लाभ या प्रचार के लिए शिगूफा नहीं छोड़ा। आज वन रैंक वन पेंशन में विसंगतियों, एक सामान मिलिट्री सर्विस पे, त्रुटिपूर्ण उत्तरधिकारी नियमों, कंप्यूट की समय सीमा में गड़बड़ियों और सहायक प्रथा को लेकर, 17 से 30 साल तक दुश्मन और मौसम से लड़ने वाले सैनिक न्यायालयों और सड़कों पर लड़ाई लड़ रहे है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो विभिन्न युद्धों में वीरता पूर्वक लड़ने वाले और वीरता पदक प्राप्त कर देश को गौरवान्वित करने वाले वीर चक्र श्रृंखला के वीरों को केवल 30 साल तक ही वीरता पदकों की वार्षिक राशि दी जाती है, उसके बाद इसे बंद कर दिया जाता है। यह एक सोचनीय विषय है कि क्या प्रदर्शित वीरता केवल 30 साल ही रहती है ? जबकि उन वीरों को वृद्धावस्था में अधिक आर्थिक सहायता की जरुरत है। इस तरह की परेशानियों से सैनिकों को निजात दिलाने के मामलों में मुलायम सिंह यादव की प्रासंगिकता बनी रहेगी ।

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