ब्यूरो छत्तीसगढ़ः सुनील चिंचोलकर।
✍️ डॉ. क्षमा पाटले “अनंत”
(अनंत अंतर्राष्ट्रीय साहित्यकार एवं समाजसेवी)
जांजगीर-चांपा, छत्तीसगढ़
चलो इस बार स्वयं दीपक बनें
‘नया अध्याय’ समाचार पत्र, उत्तराखण्ड
जांजगीर-चांपाः दीपों का पर्व दीपावली जहाँ एक ओर रोशनी, उत्साह और उल्लास का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह समाज के भीतर झाँकने का भी अवसर देता है।
हर घर की दहलीज रंगोली और दीयों से जगमगाती है, पटाखों की गूंज आसमान तक जाती है, पर क्या कभी हमने उस शोर के पीछे की सच्चाई पर ध्यान दिया है?
ध्वनि प्रदूषण से हृदय रोगी और नवजात शिशु प्रभावित होते हैं, फुलझड़ियों और पटाखों के धुएं से वायु प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है।
फिर भी लोग ऊँचे स्वर में संगीत बजाने और दिखावे की होड़ में जुटे रहते हैं।
उधर समाज का एक वर्ग — गरीब, मजदूर, असहाय —
आज भी दीपावली की मिठास से दूर है।
जहाँ एक घर रोशनी से भरा होता है,
वहीं दूसरा घर दीपक के लिए तरसता है।
एक उत्सव मनाता है, दूसरा ग़म में डूबा मातम मनाता है।
उनके चेहरों की मायूसी कोई नहीं देखता,
उनके हाथों में झूठे दोने-पत्तल आते हैं,
मगर उनके मन में भी वही चाह होती है —
मिठाई का स्वाद, नए कपड़ों की ख़ुशी और थोड़ी सी रौशनी की आस।
कहते हैं पैसा बहुत है, पर देने को चिल्लर नहीं,
कितना भी नोट छाप लो, सोच अगर छोटी है तो गरीबी मिट नहीं सकती।
दिखावे की दुनिया में संवेदनाएं कहीं खो-सी गई हैं।
डॉ. क्षमा पाटले “अनंत” कहती हैं —
“चलो इस बार स्वयं दीपक बनें,
गरीब-बेसहारों के जीवन को खुशियों से भरें।
हम हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई बाद में हैं,
पहले तो इंसान हैं।
इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं यारों।”
आओ इस दीपावली पर संकल्प लें —
हर घर तक रौशनी पहुँचाने का,
हर चेहरे पर मुस्कान लाने का,
और सच्चे अर्थों में “शुभ दीपावली” मनाने का।

शुभ दीपावली!







