लेखिका/कवयित्री
सुश्री सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
जिला रायपुर (छ.ग.)
आलेख
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मनुष्य जीवन में सब कुछ तय हैं, जन्म- मरण के चक्र से कोई नहीं बच सकते ।
अपने भीतर की गहराई में जाकर झांकने से जीवन के सार बिंदु हमें प्राप्त होते हैं। उचित- अनुचित का चिंतन किए बिना जीवन को जीना व्यर्थ प्रतित होता हैं।उच्च कोटि के जीवन शैली के निर्माण के लिए सदैव प्रेरित रहिए, जिसमें आत्म विकास के साथ मानव कल्याण का भाव निहित हो।
जीवन एक अनवरत यात्रा हैं, जहां हम सुख- दुख के विभिन्न अनुभव की लेकर चलते हैं। इस सांसारिक जीवन की अनंत व्यथाओं के बीच अपने अस्तित्व को जानने- समझने की कोशिश करते हैं। हमेशा उत्साहित होकर जीवन के हर रूप का स्वागत किजिए। जीवन के विभिन्न मोड से गुजरते हुए थकान भले ही हो जाएं, पर होठों पर मुस्कान रखिए मुरझाने मत दिजिए, अपने एहसास को। जीवन के उन रहस्यों को जानने के लिए जिज्ञासु रहिए, जिससे जीवन सामान्य से विशिष्ट बन सकें।
सिर्फ सांसों के चलते तक जीवन की कहानी होती हैं इसलिए जीवन का हर क्षण बेहद मूल्यवान हैं। इस उधार के जीवन को सारगर्भित बनाइए। मानव जीवन पाकर उसके मूल रहस्य को जानने की क्षमता विकसित किजिए। जीवन मूल्य को समझ जानें पर ही हम सार्थक जीवन की ओर अग्रसर हो सकतें हैं।
जीवन सरल हैं तो कहीं कठिन भी हैं। मन को हर द्वंद से मुक्त कर जब हम सात्विक भाव रखते हैं तब यह सरल हो जाता हैं। दया- क्षमा, करुणा-स्नेह, प्रेम-सहानुभूति, सहयोग के लिए खुद को प्रेरित करते रहिए। जीवन के घोर अंधकार में भी उम्मीद की रोशनी जलती रहती हैं। छल- कपट, बैर-ईर्ष्या, क्रोध, भोग- विलास से हर लम्हा कष्टप्रद होता हैं। मनुष्य मन का सही दिशा में विचरण जरूरी हैं, नहीं तो भटकाव होता हैं।
जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए उसे सूक्ष्म रूप से देखिए। जीवन को दिव्य- अलौकिक बनाने का प्रयास किजिए। सोचिए; हम क्या चाहते हैं ! हमारा लक्ष्य क्या हैं, हमारी चिंतन किस दिशा में हैं, हम जीवन जीवन के मूल्यों को ग्रहण कर पा रहें हैं या नहीं, क्या हम जीवन के प्रति सजग हैं, क्या हम धर्म सम्मत आचरण करते हैं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर ढूंढना हैं।
जीवन को सार्थक बनाने के लिए हमें क्या करना चाहिएं ? यह चिंतन अति आवश्यक हैं। सुबह से रात हो जाती हैं और हम सिर्फ अपने आवश्यकताओं के बारे में चिंता करते पूरा समय गुजर देते है।
मनुष्य जीवन में सब कुछ तय हैं जन्म- मरण के चक्र से कोई नहीं बच सकते ।पाने के लिए इतनी बैचेनी मत रखिए क्योंकि की एक दिन यहीं सब खो जाना हैं। सुख आंतरिक विषय हैं उसे महसूस किजिए ।रिश्तों में मत उलझे रहिए। देखते- देखते सब नष्ट हो जाएगा। निस्वार्थ कर्म की सीख देती हैं।
सुख की तलाश में हम न जाने कितने सफर करते हैं और अंत में दुखी को खुद में धारण कर लेते हैं फिर भी हम उस सुख तक नहीं पहुंच पाते जो चाहते हैं। असल में हम इस सांसारिक जीवन में रिश्ते- नाते, सगे- संबंधी, मित्रों और भौतिक वस्तुओं के इर्द- गिर्द घूमते हैं, उनसे उम्मीद करते हैं, भावनात्मक रूप से बंधे होते हैं।
हर इंसान अपने दुख- शोक, पीड़ा- संताप, में ग्रसित हैं, आत्म ग्लानि से भरे हुए।
जीवन को भाव शून्य मत बनाइए, भीतर से एकाग्र हो जाइए। डूबे मत रहिए इस सांसारिक जीवन में। आपके भीतर जो द्वंद हैं समाप्त किजिए। जब आप हृदय से निर्मल प्रेम पूर्ण और सहजता धारण कर लेते हैं, किसी परिस्थिति में विचलित नहीं होते।
अपने मन को शांत चित कर लिजिए और जीवन का आनंद लेने की कोशिश किजिए। जब तक खुद से संतुष्ट नहीं होंगे अशांत ही रहेंगे ।अपने ध्येय को महान बना लिजिए, जो स्व के विकास के लिए ही नहीं सम्पूर्ण मानवता के हित में हो ।
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(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख
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अपनों का कहना मनाने से भी जीवन में बहुत से सुखद अनुभव और विकास होते हैं।
रिश्तों की दुनिया को समझ पाना इतना आसान नहीं, इसके लिए ज्यादा दिमाग की बजाएं दिल लगाने की जरूरत होती हैं। रिश्तों को प्यार के नमी की बेहद जरूरत होती हैं, एक दूसरे से जब कोई रिश्ते जुड़ते है उसी समय से उनके प्रति हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ जाती हैं। जब हम किसी को अपना मानते हैं तब उनसे स्नेह- करूणा, दया- क्षमा के भाव स्वमेव आ जाते हैं। कभी किसी अपने को तकलीफ होने पर हमें भी दर्द होता हैं। किसी की पीड़ा और वेदना को समझ पाने से रिश्तें ही करीब आते हैं। किसी की गहराई में जाकर देखिए! बिना उनके बताएं बहुत सी बातें उनके मन की पढ़ने- सुनने और समझने के लिए मिल जाएंगी। इसलिए स्वार्थ से ऊपर होकर पहले प्रेम का नाता जोड़िए। जब हम किसी के साथ रिश्ते बनाते हैं तब, उनकी हमसे कई उम्मीद जुड़ जाती हैं। एक दूसरे के सुख- दुख में काम आना ही जिंदगी हैं। इसके लिए ज़रूरी हैं जो हमारी भलाई चाहते हैं, वे हमसे उन्हें कभी दुखी न करें। क्या चाहते है यह जाने और जो कहते हैं उस पर एक बार विचार अवश्य करें ? अगर वे हमारा हित चाहते हैं हमे ऐसे लगता हैं तो एक बार अपनी अंतरात्मा से पूछे और उनका कहना अवश्य माने। चाहे रिश्ते में कोई बड़े हो या छोटे, कोई सही और अच्छी बात कह रहें हैं तो उसे अवश्य ही माने। कहना मान लेने से भी जिंदगी में आंनद की अनुभूति होती हैं। हममें सुधार होते हैं, हम संयमी बनते हैं। आज के समय में जहां चारों तरफ़ झूठ, छल- कपट, प्रपंच -षडयंत्र, धोखे का बोलबाला हैं ऐसे कोई अगर हमारे लिए सोचते हैं तो यह सौभाग्य की बात हैं। इसलिए खुद को ही महत्व न देकर उन्हें भी सम्मान दीजिए जो आपके व्यक्तित्व विकास और उज्ज्वल भविष्य के लिए कुछ कहना चाहते हैं। एक बार जो आपसे अपनेपन से जुड़े हैं, चाहे वो- परिवार, मित्र, पड़ोस, अन्य रिश्तेदार कोई भी हो ध्यान से उनकी बात सुनें। उनका कहना मनाकर देखिए! हो सकता हैं आपको कोई अदभुत चीज मिल जाएं। जिससे आपके जीवन में नया परिवर्तन हो, लाभदायक साबित हो। आज व्यस्त जीवन में अक्सर हम समय नही दें पाते एक दूसरे को लेकिन अगर रिश्ते हैं तो उनके साथ ही चलना पड़ेगा। अपने ही धुन में रहने और किसी से मतलब न रखने से कभी -कभी हम बिल्कुल ही तन्हा हो जाते हैं। मजबूत रिश्ते का आधार एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना हैं। जब हम दूसरे की बातों को ध्यान से सुनते हैं और सही बात को उनके मानते हैं तब यह जीवन व्यवस्थित होती हैं। आज भागदौड़ से भरी व्यस्त दिनचर्या में अक्सर मानसिकता विचलित होती हैं। कभी -कभी बहुत समझदार पढ़े -लिखे और ज्ञानी होने के बाद भी विभिन्न तनाव से ग्रसित होने के कारण दिमाग काम नहीं करता और मन बेचैन रहता हैं। अक्सर आज हम अपने अधिकतर फैसले खुद ही लेते हैं।हमें लगता हैं कि हम जो कर रहे हैं वह ठीक हैं।लेकिन जीवन के सफर में कभी- कभी ज़िम्मेदारी की अधिकता के कारण हम क्रोध और चिड़चिड़े पन से भर जाते हैं। और हर तरफ़ से उलझे दिमाग को संतुलित करने के लिए हमें शांत और सहज होने के लिए, जो हमारे अपने हैं परिचित हैं जो हितैषी हैं उनके मार्गदर्शन की जरूरत होती हैं। जब हम किसी अपने से अपने मन की बात कहते हैं तो उनसे आत्मिय रिश्ता बन जाता हैं। और वे हमें अपने अनुभव से जो उचित हैं या हमारे लिए सही हैं वहीं बात कहते हैं। जिसे हमे मानना चाहिए इससे उन्हें भी खुशी होती है। आज की युवा पीढ़ी सिर्फ अपनी धुन में चल रही हैं, अपने से बड़ों का कहना मानना वे जरूरी नही समझते। यहीं वजह हैं की कई बार वे गलत दिशा में चल पड़ते हैं, क्योंकि वे जोश से भरें होते हैं। जल्दी में होते हैं उन्हें सफ़लता की चाह होती है। लेकिन सही दिशा न मिलने से कभी- कभी असफल होने से उदास हो जाते हैं। इसलिए जरूरी हैं बच्चे और युवा कहना माने। एक जिद में ही जिंदगी नहीं गुजरती इस बात पर चिंतन की उनमें क्षमता विकसित हो, यह बहुत जरूरी हैं। लेकिन अगर हम चाहते हैं की छोटे बच्चे और युवा होते बच्चे हमारा कहना माने, तो हमें भी इसके लिए प्रयास करना जरूरी हैं।सबसे पहले घर में उसके अनुकूल वातावरण का निर्माण करना होगा, हम बड़े भी अपने बुजुर्गो की बात को सुने उनको आदर दें और कहना माने। तभी हम आने वाली पीढी में भी यही संस्कार भर पाएंगे। अगर हम सिर्फ उन्हें सलाह दें कि वे कहना मानें और हम अपने से जो अनुभवी हैं, बड़े हैं उन्हें उपेक्षित करें तो यह उचित नहीं, हमें भी नियम से रहना जरूरी हैं। यकीन मानिए! कहना मान लेने से भी जीवन में बहुत प्रभाव पड़ता हैं। कभी बिगड़ते काम बन जाते हैं, टूटे रिश्ते जुड़ जाते हैं, बिखरी जिंदगी संवर जाती हैं। आज अधिकतर हम देखते हैं कई लोग एक दूसरे से किसी बात पर नाराज हो जाते हैं। किसी बात पर सामंजस्य न होने के कारण एक दूसरे से अलग हो जाते हैं। लेकिन अगर हम उनके किसी बात को मान लेते हैं, जिद छोड़ देते हैं। तो कभी- कभी हमें वो भी मिल जाता हैं जिसे पाने की उम्मीद ही हम खो दिए थे। इसलिए जो आपके हर पल में शामिल हैं, उन्हें भी खास बनाइए और अपने घमंड को तोड़कर उनसे मिलिए। कहिए आप उनका कहना मानेंगे और वो भी आपकी सुनेगे, दोनो के विचार विमर्श से एक नई राह बना लेंगे और जिंदगी को खुशहाल बनाने के हर संभव प्रयास करेगें। जैसे ही हम किसी अपने का कहना मानते हैं तो हम मर्यादा से बंध जाते हैं। मर्यादित जीवन के लिए कहना मानना जरूरी हैं।कहना मानने से जीवन में बहुत से सुधार संभव होते हैं। कई बार ऐसे अवसर आता हैं जब हमें लगता हैं हमें किसी की जरूरत नहीं हैं। लेकिन जीवन का हर पल समस्याओं से भरा हुआ हैं, कब किस मोड़ पर किसी की छोटी सी बात भी काम आ जाएं हम जान नहीं पाते हैं ? इसलिए जो जीवन के लिए जरूरी हैं, उनका कहना अवश्य ही मानिए। किसी की बातों को अनदेखा देखना करना हमारे लिए घातक हो सकता हैं। इसीलिए कहना मानने से हम विकास के पथ पर ही बढते हैं। अच्छे और सच्चे लोगो का कहना मानने से अशांत मन शांत होता हैं। हम सरल और सहज बनते हैं, व्यक्तित्व का विकास होता हैं। हमें अपनी मंजिल मिलती हैं। कहना न मानने से हम सिर्फ भटकते रहते हैं, अंजान राह में और अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। अच्छे कार्य की ओर अग्रसर होने के लिए एक दूसरे का कहना मानना जरूरी है। कहना मानने की एक बार आदत हो जाएंगी तो जीवन के विविध क्षेत्र में हम किसी भी कार्य को आसानी से कर पाने में समर्थ हो पाएंगे। किसी को सुधारने के लिए शुरुआत अपने आप से करना जरूरी हैं।
जब हम अपने परिवार, किसी मित्र, पड़ोसी रिश्तेदार, सगे- संबंधी का कहना मानते हैं। जो हमारे लिए समर्पित होते हैं तब हमे लाभ ही होता हैं, हानि नहीं होती। बड़ों के पास बहुत कुछ जानकारी होती हैं जिसे वे हमें देना चाहते है। जिसे लेने का हमे प्रयास जरूर करना चाहिए। बड़ों का कहना मनाकर हम उन्हें सम्मान जब देते हैं तो वे हमारे लिए मंगल कामना करते हैं। जो प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से हमारे जीवन के लिए शुभ फलदायक होता हैं। इससे परिवारिक माहौल तनाव पूर्ण नहीं होता, आपस में प्रेम बढ़ता हैं। घर में अनवश्यक कलह- बहस और विवाद नहीं होते शांति व्यवस्था बनी रहती हैं।
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