प्रभारी सम्पादक मध्य प्रदेशः राजेन्द्र सिंह जादौन।
निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के जरिए समाज को सुदृढ़ कर रहे ऊर्जावान और साहसिक पत्रकार व समस्त मीडिया बंधुओ को राष्ट्रीय प्रेस दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
राष्ट्रीय-प्रेस-दिवस
जब कलम बूढ़ी होती है तब पत्रकारिता से घर नही चलता ?
(नया अध्याय, देहरादून)
पिता जी कहा करते थे “पत्रकार मोहदय, एक दिन तुम्हें अहसास होगा कि पत्रकारिता से घर नहीं चलता।” उस समय यह वाक्य कड़वा जरूर लगा, मगर लगा यह भी कि शायद पिता जी पुरानी सोच के हैं, और मैं नई पीढ़ी का वह योद्धा जो सच की लड़ाई में सब कुछ दाँव पर लगाने को तैयार है। उस दौर में जोश इस कदर था कि सत्य की सेवा ही जीवन का धर्म लगती थी। लगा कि यह पेशा सम्मान देता है, और जब सम्मान मिल रहा हो तो रोटी तो रास्ता खुद बना लेगी। लेकिन आज उम्र की दहलीज पर खड़ा होकर देखूं तो सम्मान अब भी है मगर रोटी? वह आज भी रस्साकशी में अटकी है, और पिता जी की कही बात अब समझ की ठंडक से हकीकत बन चुकी है।
पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जिसमें शुरुआत में चमक दिखती है, बीच में संघर्ष पनपता है, और अंत में सन्नाटा बचता है। न्यूज़रूम की चकाचौंध, ब्रेकिंग न्यूज़ की दहाड़, एंकरों की ईगो, संपादकों की राजनीतिक गणित इन सबके पीछे सबसे उपेक्षित चेहरा वही है जो असल में पत्रकारिता को जिंदा रखता है: रिपोर्टर। वही रिपोर्टर जो धूप, बारिश, दंगे, कोरोना, दुर्घटना, चुनाव हर मैदान में खड़ा रहता है। वही रिपोर्टर जो लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए पस्त हो जाता है। लेकिन जैसे ही उसकी उम्र बाल सफ़ेद कर देती है, चैनल और अख़बार उसे याद दिलाते हैं“सर, आप युवा टीम का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। बजट कम है। आप चाहें तो कॉन्ट्रैक्ट पर आ जाइए।”
यह कैसा पेशा है जिसमें बीस साल काम करने के बाद भी इंसान को अपने ही ऑफिस में ‘अस्थायी कर्मचारी’ की तरह जीना पड़ता है? यह कैसी व्यवस्था है जिसमें हर सरकार पत्रकार को लोकतंत्र का ‘‘चौथा स्तंभ’’ बताती है, लेकिन उसी स्तंभ को गिरने से बचाने के लिए एक ईंट भी नहीं लगाती? पत्रकारों के लिए न पेंशन है, न स्थायी सुरक्षा, न भविष्य का भरोसा। किसी बीमारी में पत्रकार को सम्मान दिया जाता है इलाज नहीं। किसी दुर्घटना में परिवार को दो लाइन का शोक संदेश मिलता है सहायता नहीं। किसी बुजुर्ग पत्रकार को मिलने वाली सहयोग राशि की सूची देखकर लगता है कि जैसे सरकार कह रही हो “लोहा तो तुमने बहुत पीटा, अब लोहे के स्क्रैप की तरह बचे रहो।”
सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि पत्रकारिता उनकी सांसों जितनी जरूरी है, पर जब बात पत्रकारों के कल्याण की आती है तो सबकी सांसें ही बंद हो जाती हैं। योजनाएँ फाइलों में चमकती हैं, धरातल पर दम तोड़ती हैं। बुजुर्ग पत्रकारों की स्थिति तो और भी कड़वी है। पर्यटन में गाइड बूढ़ा होने पर बदल दिया जाता है। खेल में खिलाड़ी वृद्ध होने पर कोच बना दिया जाता है। ऑफिसों में कर्मचारी पेंशन पर विदा हो जाते हैं। लेकिन पत्रकार? वह बूढ़ा होते-होते इतना झुक जाता है कि उसके पास न कलम पकड़ने की ताकत बचती है, न कोई संस्था उसके हाथ में सहारा देती है।
समाज में हर किसी को लगता है कि पत्रकार बहुत बड़ा आदमी है, बड़ा प्रभाव है, बड़े लोग पहचानते हैं। हाँ, पहचानते हैं जब तक उसके पास माइक है। जैसे ही माइक हाथ से गिरा, पहचान भी गिर गई। यह पेशा ऐसे-ऐसे भ्रम पैदा करता है कि आदमी अपनी जिंदगी भर सम्मान का बोझ उठाता है और पेट का बोझ छुपाता है। हर जगह यह सलाह मिलती है“सर, आप यूट्यूब कर लो, पॉडकास्ट कर लो, डिजिटल में आ जाओ।” मानो 30 वर्षों की खून-पसीने की पत्रकारिता एक ट्राइपॉड में सिमट जाएगी।
पिता जी की कही बात अब समझ में आती है। वह पत्रकारिता छोड़ने की सलाह नहीं थी, बल्कि उस खाई को देखने की चेतावनी थी जो इस पेशे के अंत में खड़ी है। पत्रकारिता में नाम, शोहरत, पहचान, गदर सब है लेकिन अगर कुछ नहीं है तो बुढ़ापे की गारंटी। यह पेशा रिटायर होने का मौका नहीं देता; रिटायरमेंट तो उन नौकरियों में होता है जिनमें इंसान की गिनती एक कर्मचारी के रूप में की जाती है। पत्रकार को तो आज भी बस “आप मीडिया से हैं…” कहकर दरवाज़े पर रोक दिया जाता है।
यह संपादकीय किसी शिकायत का कागज नहीं, बल्कि उस सच्चाई का आईना है जिसे सरकारें टालती हैं, समाज समझता नहीं, और पत्रकार खुद बोल नहीं पाता। क्योंकि पत्रकारिता से देश चलता है हाँ, चलता है। लेकिन पत्रकार? वह आज भी अपने बुढ़ापे की रोटी के लिए लड़ रहा है।







