“सौतेला व्यवहार: जीवन में अलगाव की स्थिति” – सुश्री सरोज कंसारी।

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नारी शक्ति, अस्मिता की एक सशक्त प्रतीक:

 

सश्री सरोज कंसारी

मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत

कवयित्री, लेखिका व अध्यापिका

नवापारा-राजिम।

रायपुर, छत्तीसगढ़।

 

 

                                  (नया अध्याय, देहरादून)

 

“सौतेला व्यवहार: जीवन में अलगाव की स्थिति” – सुश्री सरोज कंसारी।

 

 

सौतेला व्यवहार: जीवन में अलगाव की स्थिति : प्यार की एक बूंद भी न पड़े इस मन में तो यह बंजर हो जाता है। मनुष्य जीवन मानवीय भाव पाकर दिल से खुशी महसूस करते हैं। अपनेपन की चाह तो हर किसी को होती हैं। इन सांसों में प्यार की महक जब आती हैं तो, जिंदगी बहुत खूबसूरत हो जाती है। दुनिया की भीड़ में जब हम खो जाते हैं, तब खुद को अकेले पाते हैं। एक अजीब सी बेचैनी और घुटन होती हैं। और तन्हाई घेर लेती हैं। अपनो का स्पर्श पाकर वे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं ।दुनिया में आप चाहें जितनी भी तरक्की कर ले, नाम-धन, पद- प्रतिष्ठा सब प्राप्त कर लें लेकिन आपके जीवन में किसी का प्रेम, स्नेह, दुलार, ममता की छांव नहीं हैं तो यह जिंदगी वीरान हो जाती हैं। हर तरफ़ गमगीन माहौल हो जाता हैं इसलिए इस जीवन की हर मुसीबत का सामना करने के लिए अपनो का होना, उनके साथ मन का मिलन होना बेहद जरूरी हैं। हम वैसे तो दौलत से हर सुविधा खरीद सकते हैं लेकिन दिल के रिश्ते नहीं। अपनो की चाहत और सुखद अनुभूति नही खरीद सकतें। जीवन की विविध चुनौतियों, जिम्मेदारियों को निभाते हुए थकान भरें इस मन को सिर्फ आराम की नही एक सच्चे एहसास की ज़रूरत होती हैं। अपनो के बर्ताव का जीवन में बहुत प्रभाव होता हैं मनुष्य मन बहुत नाजुक होता है। जहां भावनात्मक लगाव मिलता हैं वही ठहर जाते हैं और एक नफ़रत, क्रोध, घृणा द्वेष, बैर, जलन, ताना जैसे दुर्व्यवहार पाकर बिखर जाती हैं मानसिकता। आज हम देखते हैं अपनो से अपने का नाता एकदम कमज़ोर हैं। दिल के बंधन जरा सी नाराजगी में ही टूट जाते हैं। आज सर्वत्र स्वार्थ के भाव की अधिकता है। घमंड से सभी रिश्ते-नाते चूर हो रहें हैं, आज आपसी सुलह, सामंजस्य कर पाने में सभी असमर्थ हैं। आज अधिकांश व्यक्ति के जीवन में सौतेले व्यवहार के कारण समस्या हैं। सच में जब जिंदगी में किसी का सच्चा साथ मिलता है तो हर काम सहजता से होते हैं। अपने के होने की खुशी ही मन में एक नई ताजगी भरती है। उत्साहित करती है। जब हम किसी से जुड़कर रहते हैं। और उनसे हर बात कह देते हैं। सभी गतिविधि में शामिल करते हैं और तो मानसिक स्थिति संतुलित होती हैं। किसी के होने का एहसास ही जीवन को रोमांचित करता है। हम देखते हैं कि संसारिक जीवन में हर मनुष्य के जीवन में कोई न कोई परेशानी आती है। एक हद तक तो सब कुछ ठीक है। लेकिन, हम जब अपने व्यवहार से किसी को मानसिक रूप से विचलित कर देते हैं तब उन्हें बेचैनी होती हैं। हमारे दुर्व्यवहार से जब कोई दुखी हो जाएं तो यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात हैं। दिल में यूं तो कई बातें होती हैं। लेकिन, हर किसी की कुछ मजबूरी होती है। उन्हे सुनने, समझने और अपने से लोग न होने के कारण वो अपनी ख्वाहिश, चाहत को बता पाने में असमर्थ होते हैं। याद रखिए!

सांसारिक जीवन की यात्रा दलदल से भरा होता है, जहां बहुत संभलकर, सतर्क होकर और जागरुक होकर चलना पड़ता है। जरा सी लापरवाही करने से, हम बुरी तरह से उसमें फंस जाते हैं। इस सफर को सफलता पूर्वक पार करने और पुण्य कमाने के लिए भाव की शुद्धता बेहद जरूरी है। कुविचार से भरकर हम अपनो से रिश्ते नही निभा सकते, न ही उनके दिल में ठहर सकते हैं। आपसी समझदारी, सहनशील धैर्य, हिम्मत की हर कदम पर जरूरत होती है। धोखे, षडयंत्र, झूठ और सबसे ज्यादा अपनों से ही सौतेला व्यवहार पाकर, किसी बात को लेकर घुटने वाले इंसान के मन में, कहने के लिए हजारों बाते होती हैं। लेकिन, बेबसी उस समय हो जाती है, जब अपनो के बीच ही कोई एकदम तन्हा हो जाएं। उसकी परवाह करने सोचने और उन्हें अपनापन देने वाले कोई न हो। जीवन निर्वहन के लिए एक दूसरे के साथ की ज़रूरत इंसान को होती हैं। रिश्तों को बनाए रखने के लिए हर संभव उपाएं करते ही हैं ।रिश्ते ही हमे जीवन को जीने की कला सिखाते हैं, हम उनके प्रति अपने फर्ज को निभाते हैं। लेकिन पारिवारिक जीवन में हर पग पर नई जंग की शुरुवात होती हैं।शारिरिक, मानसिक, आर्थिक कई तरह की कष्ट-पीड़ा को सहन करके आगे बढ़ना होता है…रिश्ते नाजुक होते हैं जरा सी गलतफहमी, नाराजगी, कड़वाहट संदेह, कठोरता से भी बिखरने लगते हैं। कभी-कभी स्थिति एकदम गंभीर और चिंतनीय हो जाती हैं। उसके लिए कोई बड़ा फैसला भी लेना पड़ता है। लेकिन वर्तमान को देखकर हम जो भी करते है, उसके लिए भविष्य की गारंटी नहीं दे सकते। कल क्या होगा ये तो कोई भी नही जानते?

जैसे परिवार में माता-पिता के साथ बच्चे रहते हैं, तब तक उन्हें कोई समस्या नहीं होती। वे अपने बच्चों के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं होने देते हैं। उन्हें बेहद प्यार देते हैं। उनकी हर एक जरुरत का खयाल भी रखते हैं। वास्तविक में प्यार पाकर, हर शख्स निखरता है और नफ़रत पाकर मुरझा जाते हैं। अपने और पराएं, सगे और सौतले पन के व्यवहार से ही सारे किस्से बनते और बिगड़ते हैं। आज वर्तमान दृश्य अतीव दुखद है। पारिवारिक कलह व विवाद, बहस और आपसी मनमुटाव के कारण आज अधिकतर जिन्दगी तन्हा पीड़ित और दुखी हैं। परिवार में एक साथ रहते हुए माता- पिता की किसी कारण वश तलाक या मृत्यु हो जाएं तो, बच्चों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ता है। फिर बच्चों के देखभाल के लिए घर के लोग दूसरी विवाह के लिए सलाह देते हैं। लेकिन, अधिकतर बच्चे सौतेले माता-पिता या किसी भी रिश्ते को अपना नहीं पाते या जल्द नही स्वीकार पाते। सौतेले रिश्ते के प्रति बहुत लोगो की धारणा पहले से ही नकारात्मक हैं। सौतेले रिश्ते बनने के बारे में सोचकर ही मन में डर-भय, दहशत का माहौल होता है। सौतेला अर्थात संगे न होकर भी किसी रिश्ते का निर्वहन। वैसे हर इंसान का स्वभाव अलग होता है। सब सौतेले रिश्ते चाहे- माता-पिता, भाई-बहिन, चाचा-चाची कोई भी हों! गलत नहीं होते हैं। कई लोग रिश्ते के अभाव में भी बहुत दिल से निभाते हैं। हर किसी को और उन्हें किसी अपने का कमी नहीं होने देते हैं। कई बार अपने खून के रिश्ते होकर भी अपने ही तकलीफ देते हैं। सौतेला व्यवहार से आज अधिकतर जीवन में बिखराव है। अपने होकर भी वे अपनो से दुखी हैं। किसी न किसी मजबूरी वश निभा रहे हैं। किसी भी रिश्ते में परायेपन का एहसास जिन्दगी को हर एक खुशी के लिए मोहताज कर देती है। सौतेले रिश्ते में हर किसी से दुर्व्यवहार नहीं मिलता। लेकिन जिसे मिलता है। वे गुमसुम हो जातें हैं। एक ही परिवार में रह रहे बच्चो में, अपने बच्चे की ज्यादा देखभाल और सौतेले की उपेक्षा की जाएं तो उनके मन में नकारात्मक सोच का जन्म होता है। वे अक्सर अकेले में रोते हैं। किसी अपने को तलाश करते हैं। भेदभाव पूर्ण व्यवहार से कभी-कभी अधिक क्रोधित हो जाते हैं। किसी प्रकार से कमी हो, ताना मिले और उन्हें हर वक्त शारीरीक और मानसिक तनाव देकर तो प्रताड़ित करने वाले व्यक्ति सदा के लिए, दिल से उतर जाते हैं। उनकी छवि एक पत्थर दिल के व्यक्ति के रूप में अंकित हो जाती है। सौतेले व्यवहार सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चे को होता हैं। वे भावुक होते हैं। प्यार, परवाह व सुरक्षा और अपनो को न पाकर सहम जाते हैं। कभी-कभी उनके व्यक्तित्व का विकास रुक जाता हैं। हुनर होते हुए भी उसे प्रदर्शित नहीं कर पाते हैं। हर पल एक घुटन सी होती है। अधिकतर खामोश और गुमसुम से रहते हैं। जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, अफसोस का एक गहरा समंदर होता है। उनके दिल दिमाग में। कोई भी व्यक्ति हो बेवजह तकलीफ देने वाले, हक छीनने और ताने देने वाले को कभी नही भूलते और न ही कभी माफ करते हैं। भले ही वे उच्च मुकाम में पहुंच जाएं, सफलता प्राप्त कर ले। लेकिन, जो प्यार, दुलार, सम्मान और अपनापन बचपन में मिलना था और किसी की वजह से नहीं मिल पाया। वो दर्द बनकर जीवन के हर मोड पर रह जाता है। रिश्तों की इस नाजुक डोर को, सिर्फ प्यार से हम मजबूती से बांध सकते हैं। जीवन के पथ पर चलते हुए कई बातें होती हैं और अनेक रिश्ते बनते हैं और गलतफहमी से टूट भी जाते हैं। लेकिन याद रखिए ! हम सभी इंसान हैं और जिस रिश्ते को निभाने की हमें जिम्मेदारी मिली है, उन्हें सच्चे और शुद्ध भाव और बिना किसी षडयंत्र के निभाइए। किसी को अपने व्यवहार से रोने, तड़पने और सिसकने की वजह मत दें। यह जीवन है। कभी भी कुछ भी हो सकता है। निस्वार्थ रहिए। रिश्ते का कभी गलत फायदा मत उठाइए। जिसके साथ हैं उनके प्रति वफादार रहिए। किसी के मन से आपके लिए सिर्फ बददुवा निकले वह व्यवहार या कार्य कभी मत किजिए। त्याग और समर्पण की जहां जरुरत है कीजिए, हर किसी की सम्मान भरपूर करना चाहिए।

ये अनमोल समय कभी भी, एक जैसा नहीं रहता है, किसी भी क्षण कुछ भी हो सकता है। अहंकार को बढ़ावा मत देना कभी भी जीवन में।

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