प्रभारी सम्पादक (म. प्र.): रजेन्द्र सिंह जादौन।
दो साल बेमिसाल नवरत्न मालामाल..?
(नया अध्याय, देहरादून)
किसी भी राज्य के शासन की मजबूती उसके राजा की नीयत और उसके नवरत्नों की निष्ठा पर खड़ी होती है। लेकिन मध्यप्रदेश की सत्ता-गाथा में यह संतुलन गड़बड़ा गया है। राजा सहज है, सरल है, जनता से जुड़े रहने वाला है, लेकिन उसके आसपास बैठी सलाहकारों और नवरत्नों की टोली ऐसी बन चुकी है जो राज्य को चलाने में राजा की मदद नहीं कर रही बल्कि राजा को चलाकर अपना साम्राज्य खड़ा कर रही है। दो साल में अगर कोई सबसे ज्यादा मालामाल हुआ है तो वे नवरत्न हैं जो दरबार के किनारों पर बैठकर सत्ता का असली संचालन कर रहे हैं।
राजा ने यह सोचा था कि योग्य नवरत्न प्रदेश की नीतियों को स्पष्ट दिशा देंगे, फैसलों में पारदर्शिता और जनता के प्रति जवाबदेही स्थापित करेंगे, लेकिन जिस समूह पर उसने भरोसा किया उसने सत्ता को परामर्श का मंच नहीं, बल्कि अवसरों की थाली के रूप में अपनाया। सलाह अब नीति से नहीं, सुविधा से निकलती है। फाइलें अब नियम से नहीं, इच्छाशक्ति से आगे बढ़ती हैं। और प्रजा की तकलीफें अब कागज पर नहीं, ठंडे कमरे में दबे फुसफुसाहटों में सिमटकर रह गई हैं।
राजा की सहजता उसकी ताकत थी, लेकिन वही सहजता अब दरबारियों के लिए उसका सबसे बड़ा हथियार बन गई है। नवरत्न राजा को खुश रखने में इतने निपुण हो चुके हैं कि उन्होंने सच और झूठ के बीच उस पतली रेखा को पूरी तरह मिटा दिया है जो शासन को जनता से जोड़कर रखती है। राजा को दिखाया वही जा रहा है जो नवरत्नों के लिए लाभकारी है। उसे बताया वही जा रहा है जिससे भ्रम बना रहे कि सब कुछ सामान्य है, जबकि जमीन पर सच्चाई उससे बिल्कुल विपरीत खड़ी है।
दरबार के ये नवरत्न अपने-अपने क्षेत्रों में महारथी के नाम पर बैठे हैं किसी को मीडिया संभालना है, किसी को वित्तीय रणनीति तय करनी है, किसी को कला-संस्कृति का संरक्षण करना है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि इन भूमिकाओं का इस्तेमाल प्रदेश के सुधार के बजाय निजी व्यापार की तरह किया जा रहा है। मीडिया सलाहकार का काम वास्तविकता दिखाना नहीं, राजा को यह यकीन दिलाना है कि हर आवाज विपक्ष की चाल है और हर आलोचना अविश्वसनीय। वित्तीय सलाहकार का काम बजट तैयार करना नहीं, बजट के रास्तों में उन नलों को जोड़ना है जिनसे चंद नजदीकियों का फायदा तय है। कला-संस्कृति वाले सलाहकारों का काम परंपराओं को सहेजना नहीं, नए-नए आयोजनों के नाम पर ठेकेदारों की सूची बनाना है।
राजा को धीरे-धीरे अहसास हो रहा है कि जिन लोगों पर उसने भरोसा किया वही आज राज्य की नीतियों को बेड़ियों में जकड़ रहे हैं। फाइलें जब उसके पास पहुंचती हैं तो उनमें संशोधन किसी और का लिखा होता है। समीक्षा बैठकों में जो रिपोर्टें उसके सामने रखी जाती हैं वे वास्तविकता नहीं बल्कि “तैयार की गई छवि” होती हैं। और यही वह भ्रम है जिसे दरबारी बनाकर रखना चाहते हैं, क्योंकि राजा जितना अनभिज्ञ रहेगा, वे उतने शक्तिशाली बने रहेंगे।
राजा को चिंता है कि सही नवरत्न कहाँ से मिलेंगे। यह चिंता सहज है, क्योंकि आज का प्रशासन कुर्सियों से नहीं, कुर्सियों के आसपास बैठे उन लोगों से चलता है जिनके हाथ में असली नियंत्रण है। राजा की लोकप्रियता जनता ने दी है, लेकिन राज्य का संचालन दरबारियों ने कब्जे में ले रखा है। किसी परियोजना का ठप पड़ना हो या किसी विभाग का ठहर जाना राजा को इसकी सूचना तब मिलती है जब हालात खराब हो चुके होते हैं, और वह भी डिलुटेड रूप में, ताकि नवरत्नों की भूमिका संदेह से बाहर रहे।
राजा का दर्द यही है कि वह विकास चाहता है, लेकिन विकास का रास्ता उन सलाहकारों ने पत्थरों से भर दिया है जो अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि चाटुकारिता और संपर्क से इस स्थान पर बैठे हैं। वे राजा के सामने हर सुबह वही गान छेड़ते हैं कि प्रदेश उनके नेतृत्व में ऐतिहासिक प्रगति कर रहा है। और इस प्रशंसा के जाल में राजा को लगता है कि सब कुछ ठीक है। यह अहसास असली नहीं, बल्कि रचा हुआ है। सत्ता के भीतर इसी तरह भ्रमों का महल बनाया जाता है ताकि असल व्यवस्था किसी और के हाथ में रहे और राजा मुस्कुराता रहे।
राजा जानता है कि वह ईमानदार है, लेकिन ईमानदारी अकेले क्या कर सकती है जब उसके आसपास बैठे लोग जिनकी जिम्मेदारी सलाह देने की है, वही सलाह को बेच रहे हों। उन्हें पता है कि राजा विनम्र है, इसलिए उन्होंने उसकी विनम्रता को कमजोरी में बदल देने की कला सीख ली है।
राज्य की नीतियाँ, योजनाएँ, घोषणाएँ आल अब उन टेबलों पर तय होती हैं जहाँ संविधान नहीं, हितैषी सर्कल बैठते हैं। राजा को जनता की चिंता सताती है, लेकिन सलाहकारों को अपनी अगली विदेश यात्रा, अगली सरकारी गाड़ी, अगली परियोजना, अगली नियुक्ति यही सब सताता है। प्रदेश और जनता इस सूची में कहीं बहुत पीछे है।
अब राजा की आंखें धीरे-धीरे खोल रही हैं। वह महसूस कर रहा है कि जो नवरत्न इतिहास में राज्य की शान बढ़ाते थे, वे नवरत्न आज राज्य की रीढ़ तोड़ रहे हैं। सत्ता में आने के दो साल बाद यह समझ बन रही है कि दरबार के ये चमकते चेहरे वास्तव में राज्य के नहीं, अपनी-अपनी जेबों के भक्त हैं।
राजा को अब ऐसे नवरत्नों की तलाश है जो सच्चाई बोलने का साहस रखते हों, निर्णयों में निष्पक्षता लाते हों और जनता के बीच जाकर उसकी नब्ज को समझते हों। उसे ऐसे लोगों की जरूरत है जो व्यवस्था को सुधारें, न कि व्यवस्था को अपने प्रभाव में लेकर उसे व्यक्तिगत मुनाफे की खदान बना दें।
क्योंकि आज के नवरत्न बेशक मालामाल हैं, लेकिन राज्य? वह अभी भी सच्चे नवरत्नों की प्रतीक्षा में खड़ा है आशा में, उम्मीद में, और भरोसे के किसी नए क्षण का इंतज़ार करते हुए।







