राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(संरक्षक)
आदर्श समाज स्वप्न साकार संस्था
बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
संस्मरण 21
मेगालोमेनिया के मरीज बढ़ रहे हैं।
उम्र जैसे बढ़ती है,, अनेक प्रकार की बीमारियां और अजीब से आचार विचार मन आठों पहर आने लगते हैं। मनोविज्ञान में id,एगो, सुपर एगो,, अर्थात सुप्रिटी कॉम्प्लेक्स भी एक मानसिक बीमारी है। इसके अलावा आजकल हर जगह एक बीमारी हरेक आदमी में देखी जा रही है जिसे मेगालोमेनिया कहते हैं। इस बीमारी में व्यक्ति को खुद को सर्वशक्तिमान और बुद्धिमान मानने का भ्रम होता है। इसे हम अहंकारोन्माद भी कह सकते हैं। इसके कुछ और पर्यायवाची शब्द हैं जैसे अतिमहत्त्वाकांक्षा, महत्त्वोन्माद, तीव्र लालसा, बढ़ाई का ख़ब्त, महामान्यता उन्माद आदि। वास्तव में मेगालोमेनिया शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है:-
मेगालो- जिसका अर्थ है बड़ा या महान
मेनिया जिसका अर्थ है पागलपन या उन्माद
इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले 19वीं सदी के अंत में हुआ था. एक फ़्रांसीसी न्यूरोलॉजिस्ट ने इस स्थिति के बारे में विस्तार से बताते हुए एक पेपर दिया था. साल 1918 में यह शब्द लोकप्रिय हो गया था. इतिहास में सिकंदर महान, चंगेज खान, और नेपोलियन बोनापार्ट जैसे लोग अहंकारोन्मादी व्यक्तियों के उदाहरण हैं.
(नया अध्याय, देहरादून)
आजकल हर गली, मोहल्ले में यहां अपने घर की देहलीज, दीवारों पर मेगालो मेनिया के प्रतीक देखने मिल जाएंगे। हद जब होती है जब किसी वार्ड, मोहल्ले में गांव का एक मेगालो ,,,मेनिया का शिकार रहने लगे। उसकी हरक़त देखें तो वह कभी तेज स्पीकर में घिसे पीटे गाने लाउड स्पीकर सुनाएगा बिना बुलाए घर घर पहुंचकर अपने अति बुद्धिमान होने का प्रमाण पत्र बांटेगा। तिथि त्यौहार पर कल्फदार कुर्ता पायजामा पहन कर माइक अपना मुंह चिपका लेगा फिर अहंकारी बोल से अपना रक्तचाप बड़ा लेगा। ख़ुद को सर्वे सर्वा समझ अन्य लोगों को दास/ गुलाम समझने लगता है।
व्यक्ति से ऊपर जब मेगलोमेनिया जाति, संप्रदाय में फैल जाती है तब लॉ एंड ऑर्डर संभालने की स्थिति पैदा हो जाती है। आजकल लव मेरिज में लड़का लड़की शादी विवाह तो कर लेते हैं लेकिन एक दूसरे के धर्म से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते नतीजन अनेक घर टूटने की कगार कर हैं। मेगलो मेनिया के शिकार हर क्षेत्र में मिल जाएंगे यहां तक नौकरशाही में सीधे सीधे देखें जाते हैं। अधिकारी की पोस्टिंग से लोग रिश्ते नाते जोड़ने लगते हैं।
तीन दिन पहले संविधान दिवस के अवसर पर टी वी चैनल पर उद्बोधन सुन रहा था। वक्ता जी पूरे वक्तव्य में अपना गुणगान सुनाते रहे। श्रोता / दर्शक चाहते थे कि बदलते हालात में अब उन्हें क्या करना है? ताकि संविधान का समुचित पालन हो और उसकी रक्षा कैसे की जाए ? इस विषय पर वक्ता एक शब्द नहीं बोल सके।
समय की मांग है कि हम मेगलोमेनिया जैसे रोग से पीड़ित आदमी से बचे न कि उसके शिकार हो जाएं ताकि संविधान की रक्षा हो सके।
जय संविधान







