प्रभारी सम्पादक (म.प्र.): राजेन्द्र सिंह जादौन
नया अध्याय
‘सफेद झूठ’ की राजनीति में फँसे सिंधिया और संचार साथी ऐप का सच?
देश में डिजिटल फ्रॉड, मोबाइल चोरी और साइबर अपराध बढ़ने के नाम पर केंद्र सरकार ने ‘संचार साथी’ ऐप को हर नए स्मार्टफोन में अनिवार्य करने का फैसला किया। बात यहीं तक होती तो इसे एक आम प्रशासनिक प्रक्रिया माना जाता, लेकिन विवाद तब भड़का जब केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दावा किया कि यह ऐप पूरी तरह वैकल्पिक है जनता चाहे तो डिलीट कर दे, चाहे तो डिसेबल कर दे। बयान ठीक वैसा था जैसा टीवी पर चुनावी मौसम में दिया जाने वाला भरोसों से भरा आश्वासन होता है। लेकिन मुश्किल यह कि हक़ीकत मंत्री के बयान के ठीक उलट सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज है।
क्योंकि संचार मंत्रालय ने मोबाइल कंपनियों को साफ़-साफ़ निर्देश भेजे हैं कि ‘संचार साथी’ ऐप प्री-इंस्टॉल होना चाहिए और सिस्टम सेटअप में दिखना भी चाहिए। मज़ेदार यह कि निर्देश में कहीं भी यह नहीं लिखा कि ऐप को हटाया जा सकता है। उलटे कई कंपनियों से यही कहा गया है कि यह सिस्टम-लेवल ऐप होगा, यानी न तो आसानी से हटेगा और न ही यूज़र इसे डिसेबल कर सकेगा। सवाल उठे, तो मंत्रालय चुप।
लेकिन जनता को भरोसा दिलाने के लिए मंच पर सिंधिया बोले “आप चाहें तो ऐप डिलीट कर सकते हैं।” अब लोग पूछ रहे हैं तब फिर निर्देश किसके लिए? उद्योगों को आखिर किस चीज़ के लिए मजबूर किया जा रहा है?
विवाद की दूसरी परत सरकार की प्रेस विज्ञप्ति है। PIB की घोषणा कहती है “Sanchar Saathi: Now Mandatory on All New Smartphones in India.” यानी सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि ऐप अनिवार्य है। “अनिवार्य” का अर्थ क्या होता है? वही जिसे आप हटाने की आज़ादी नहीं रखते। कोई भी ऐप जिसे सिस्टम के साथ जबरन जोड़ा जाए, वह उपभोक्ता की पसंद का विषय नहीं रहता। तो फिर सिंधिया का बयान क्या था अपूर्ण जानकारी, राजनीतिक बचाव या जनता को एक मीठा सफेद झूठ?
ऐप की मंशा पर कोई विवाद नहीं है। यह चोरी का फोन ट्रैक करने, फर्जी IMEI पकड़ने और मोबाइल धोखाधड़ी से निपटने में मदद करता है। यह पहल अच्छी भी है और ज़रूरी भी। लेकिन समस्या यह है कि अच्छाई के नाम पर सरकार वह सब कुछ अनिवार्य करने लग जाए जिसे नागरिकों को चुनने का अधिकार होना चाहिए, तो लोकतंत्र पर सवाल उठते ही हैं। तकनीकी विशेषज्ञ कह रहे हैं कि किसी भी फोन में सरकारी ऐप को सिस्टम-लेवल पर लॉक करना निजता का जोखिम है। अगर ऐप उपभोक्ता की अनुमति के बिना कुछ भी पढ़ या एक्सेस कर सकता है, तो खतरा साफ है। सरकार कहती है कि ऐसा कुछ नहीं होगा, मगर जनता अब “कहा” पर नहीं, “साबित” पर भरोसा करती है।
विपक्ष और नागरिक संगठन इसे निगरानी तंत्र की शुरुआत मान रहे हैं। Apple और कई एंड्रॉयड निर्माता भी इस आदेश से असहज हैं। Apple पहले भी भारत सरकार के कई डेटा-साझाकरण प्रस्तावों पर सवाल उठा चुका है। ऐसे में संचार साथी को अनिवार्य करने का फैसला उनके लिए तकनीकी और नीतिगत संघर्ष बन सकता है। भारत जैसे विशाल मोबाइल बाज़ार में यह दबाव कंपनियों पर भी पड़ता है कि वे सरकारी दिशा-निर्देशों से टकराव न लें। लेकिन सवाल यह है जब तकनीकी विशेषज्ञों को भी साफ नहीं समझ आ रहा कि ऐप कितनी गहराई तक सिस्टम में बैठाया जाएगा, तो आम जनता से कैसे उम्मीद की जाए कि वह इसे ‘सिर्फ सुरक्षा का टूल’ माने?
सबसे बड़ा सवाल सिंधिया के बयान पर है। अगर ऐप वाकई वैकल्पिक है, तो निर्देश क्यों कहते हैं कि यह अनिवार्य है? अगर इसे हटाया जा सकता है, तो मंत्रालय उद्योगों को क्यों बता रहा है कि ऐप डिसेबल नहीं होना चाहिए? अगर सरकार पारदर्शी है, तो सेटअप स्क्रीन में इस ऐप को जबरन क्यों दिखाने की ज़िद है? और अगर सब कुछ जनता के हित में है, तो फिर जनता को आधी-अधूरी, विरोधाभासी जानकारी क्यों दी जा रही है?
आज की राजनीति में सफेद झूठ एक सामान्य हथियार बन गया है। वह झूठ जिसे कहा भी जा सकता है, पकड़ा भी जा सकता है, और फिर राजनीतिक स्पष्टीकरण की चादर से ढक भी दिया जाता है। “आप चाहें तो हटाएँ,” जैसा बयान देकर सिंधिया ने जनता को भरोसा दिलाने की कोशिश की, लेकिन सरकारी दस्तावेज़ ने उसी वक्त उनका दावा झुठला दिया। यह वही स्थिति है जिसमें नेता एक बात कहते हैं, मंत्रालय दूसरी चलाता है, और जनता तीसरे भ्रम में फँस जाती है।
दरअसल असली सवाल ऐप का नहीं, मंशा का है। डिजिटल सुरक्षा के नाम पर नागरिक की पसंद और निजता की बलि न दी जाए यह लोकतंत्र का न्यूनतम सिद्धांत है। सरकार को चाहिए कि वह साफ बताए कि ऐप वास्तव में अनिवार्य है या वैकल्पिक। जनता को यह भी बताया जाए कि ऐप कौन-कौन सा डेटा देख सकता है और किसे भेज सकता है। और सबसे जरूरी यह कि मंत्रालय, मंत्री के बयान और PIB की भाषा में एकरूपता आए, वरना ‘सफेद झूठ’ का दाग आसानी से नहीं धुलता।
अभी स्थिति यही है ऐप अनिवार्य है, बयान स्वैच्छिक है, और जनता भ्रमित है। और जब सत्ता भ्रम पैदा करे, तो सवाल पूछना जनता का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।







