दार्शनिक कविवर सूर्य
प्रख्यात समाज-सुधारक एवं प्रखर आध्यात्मिक विचारक,
मानवतावादी, साहित्यकार।
(नया अध्याय, देहरादून)
“अंतःकरण का दर्पण: मौन, मन और मानवता”
— युगपुरुष कविवर सूर्य।
“प्रस्तुत आलेख समाज हेतु अतिशय प्रेरणादायक एवं अत्यंत उपयोगी है।”
सतर्कता: सृष्टि के प्रत्येक जीव का अंतःकरण कोमल नहीं होता। समाज के ‘मानव-रूपी भेड़ियों’ से बचें। सबका कल्याण ही परम धर्म है। रात-भर जागकर सोचना और रोना व्यर्थ है, कभी-कभी मौन शब्दों से अधिक कह जाता है। जिसने आपको रुलाया है, समय उसे न्याय का आईना अवश्य दिखाएगा। भावनाओं की गहराई को समझें और आज के इस स्वार्थी युग में, उस इंसान का सम्मान करें जिसका हृदय शुद्ध और सरल है।
मन और धैर्य: समस्त”दुखों की जड़ हमारा मन है और इसका एकमात्र उपचार धैर्य है। मन को मारने के बजाय उसे प्रेम और समझदारी से समझाना सीखें। स्वतंत्र रहें। भीड़ और इंसान के बीच के अंतर को समझें; भीड़ के पास न समझ होती है, न ज्ञान। स्वयं को भीड़ का हिस्सा बनने से बचाएं।
भीड़ से व्यक्तित्व तक: एक आत्म-चिंतन – आज के समाज में अक्सर लोग भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं और अपनी व्यक्तिगत पहचान खो देते हैं। भीड़ से अलग एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए आत्म-चिंतन महत्वपूर्ण है। यह हमें अपनी क्षमताओं, मूल्यों और लक्ष्यों को समझने में मदद करता है। प्रयास यह करें कि सर्वत्र सबका कल्याण हो।
नारी और समाज: इस भेड़िये-समान समाज में, जहाँ लोग हृदय को आहत करते हैं और सुख छीन लेते हैं, मैंने बाजारों में खुलेआम दुराचारियों को भटकते देखा है। वे मानव नहीं, अपितु हैवान हैं; इनका समूल नाश होना चाहिए। स्त्रियाँ पूजनीय होती हैं, उन्हें वह उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। वे उपभोग की वस्तु नहीं हैं, अपितु आराध्य हैं; उनकी अर्चना करें। नारी की कोख से ही मर्यादा पुरुषोत्तम ‘राम’ का अवतरण हुआ, जिन्होंने आजीवन मानवता के कल्याण हेतु संघर्ष किया। उनके पास वैभवशाली प्रासाद अवश्य थे, किंतु उन्होंने जन-सेवा और कर्तव्यों की पूर्ति हेतु कुटिया के संयमित एवं अनुशासित जीवन को चुना। महर्षि दयानंद सरस्वती समाज में सुधार और नारी को गरिमापूर्ण स्थान दिलाना चाहते थे। लेकिन षड्यंत्रकारियों ने उन्हें दूध में पिसा हुआ कांच पिलाकर मृत्यु के मुख में धकेल दिया। इस दुनिया में क्रूर और बुरे लोग हमेशा रहेंगे, परंतु दयानन्द जी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। “इस वसुंधरा के समस्त प्राणियों का स्वभाव कोमल अथवा सरल नहीं है; यहाँ मानवीय मुखौटों में पशुवत क्रूरता रखने वाले भेड़ियों की बहुलता है। अंततः, आत्म-चिंतन और धैर्य ही वे अस्त्र हैं, जिनसे हम इस जटिल समाज में अपनी पहचान व शांति सुरक्षित रख सकते हैं। …लेख की समाप्ति…निश्चित ही, यह आलेख समाज हेतु अतिशय प्रेरणादायक एवं अत्यंत उपयोगी है।
सबका कल्याण हो। जयतु भारतम्।
“भारतीय संस्कृति के संरक्षक, सामाजिक समता एवं एकात्मता के प्रतीक”







